अध्याय 18. आनुवंशिकी, जैव प्रौद्योगिकी एवं जैव विकास
Genetics, Biotechnology and Evolution
Noble Exam City
Smart Preparation, Sure Selection
1. आनुवंशिकी का परिचय एवं इतिहास (Introduction to Genetics)
आनुवंशिकी (Genetics) जीव विज्ञान की वह शाखा है जिसमें जीवों के आनुवंशिक गुणों, उनकी वंशागति (Heredity) तथा पीढ़ी-दर-पीढ़ी उनमें होने वाली विविधताओं (Variations) का अध्ययन किया जाता है। माता-पिता से संतानों में आँखों का रंग, बालों की बनावट, रक्त समूह, कुछ शारीरिक विशेषताएँ तथा अनेक जैविक लक्षण आनुवंशिक पदार्थ के माध्यम से स्थानांतरित हो सकते हैं।
वंशागति के अध्ययन से यह समझने में सहायता मिलती है कि किसी जीव के लक्षण किस प्रकार अगली पीढ़ी तक पहुँचते हैं। आनुवंशिक विविधता के कारण एक ही प्रजाति के व्यक्तियों में भी अंतर दिखाई देता है। आनुवंशिकी का उपयोग चिकित्सा विज्ञान, कृषि, पशुपालन, जैव प्रौद्योगिकी, अपराध अनुसंधान और विकासवाद के अध्ययन में किया जाता है।
आनुवंशिकी के विकास में प्रमुख वैज्ञानिक
| वैज्ञानिक | प्रमुख योगदान |
|---|---|
| ग्रेगर जॉन मेंडल | मटर के पौधे पर प्रयोग करके वंशागति के मूल नियम प्रस्तुत किए; आनुवंशिकी के जनक कहलाते हैं। |
| विलियम बेटसन | Genetics शब्द को लोकप्रिय एवं वैज्ञानिक उपयोग में लाने वाले प्रमुख वैज्ञानिक; 1905 में इस शब्द का प्रयोग किया। |
| फ्रेडरिक मीशर | 1869 में कोशिका के केंद्रक से न्यूक्लिन नामक पदार्थ पृथक किया, जिसे बाद में न्यूक्लिक अम्ल के रूप में पहचाना गया। |
| वाल्टर सटन एवं थियोडोर बोवेरी | गुणसूत्रीय वंशागति सिद्धांत (Chromosomal Theory of Inheritance) के विकास में योगदान। |
| थॉमस हंट मॉर्गन | ड्रॉसोफिला मक्खी पर प्रयोग द्वारा गुणसूत्रों, लिंग-सहलग्न वंशागति एवं जीन मैपिंग के अध्ययन में योगदान। |
| फ्रेडरिक ग्रिफिथ | 1928 में जीवाणुओं पर प्रयोग करके रूपांतरण (Transformation) की घटना प्रदर्शित की। |
| ओसवाल्ड एवरी, कॉलिन मैकलियोड एवं मैक्लिन मैकार्टी | प्रयोगों द्वारा DNA को रूपांतरणकारी सिद्धांत (Transforming Principle) के रूप में पहचाना। |
| अल्फ्रेड हर्शे एवं मार्था चेज | 1952 के बैक्टीरियोफेज प्रयोग से DNA की आनुवंशिक भूमिका के पक्ष में प्रमाण दिया। |
| जेम्स वाटसन एवं फ्रांसिस क्रिक | 1953 में DNA की द्विकुंडली संरचना का मॉडल प्रस्तुत किया। |
| रोजालिंड फ्रैंकलिन एवं मॉरिस विल्किंस | DNA की संरचना समझने में महत्त्वपूर्ण एक्स-रे विवर्तन संबंधी प्रमाण उपलब्ध कराए। |
2. ग्रेगर जॉन मेंडल एवं उनके प्रयोग
ग्रेगर जॉन मेंडल (Gregor Johann Mendel) का जन्म 1822 में हुआ था। उन्होंने मटर के पौधे (Pisum sativum) पर संकरण प्रयोग करके यह समझाया कि लक्षण एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में किस प्रकार पहुँचते हैं। उनके प्रयोगों के परिणाम 1866 में प्रकाशित हुए। लंबे समय तक उनके कार्य को व्यापक पहचान नहीं मिली, लेकिन 1900 के आसपास ह्यूगो डी व्रीज, कार्ल कोरेन्स और एरिक वॉन शेरमाक ने स्वतंत्र रूप से उनके निष्कर्षों की पुनर्खोज की।
मेंडल ने मटर का पौधा ही क्यों चुना?
- मटर का पौधा आसानी से उगाया जा सकता है।
- इसका जीवन चक्र अपेक्षाकृत छोटा होता है।
- इसमें स्वपरागण स्वाभाविक रूप से होता है।
- कृत्रिम परपरागण भी आसानी से कराया जा सकता है।
- इसमें कई स्पष्ट विपरीत लक्षण पाए जाते हैं।
- इससे एक साथ बड़ी संख्या में संतति प्राप्त की जा सकती है।
मेंडल द्वारा अध्ययन किए गए सात जोड़ी विपरीत लक्षण
| लक्षण | प्रभावी रूप (Dominant) | अप्रभावी रूप (Recessive) |
|---|---|---|
| बीज का आकार | गोल (Round) | झुर्रीदार (Wrinkled) |
| बीज का रंग | पीला (Yellow) | हरा (Green) |
| फूल का रंग | बैंगनी (Violet/Purple) | सफेद (White) |
| फली का आकार | फूली हुई (Inflated) | संकुचित (Constricted) |
| फली का रंग | हरा (Green) | पीला (Yellow) |
| फूल की स्थिति | अक्षीय (Axial) | शीर्षस्थ (Terminal) |
| तने की लंबाई | लंबा (Tall) | बौना (Dwarf) |
एकसंकर संकरण (Monohybrid Cross)
जब दो जनकों के बीच केवल एक जोड़ी विपरीत लक्षणों को लेकर संकरण कराया जाता है, तो उसे एकसंकर संकरण कहते हैं। उदाहरण के लिए लंबे और बौने मटर के पौधे का संकरण।
F1 पीढ़ी: सभी Tt (लंबे)
F1 का स्वपरागण: Tt × Tt
F2 जीन प्रारूप अनुपात: 1 TT : 2 Tt : 1 tt
F2 लक्षण प्रारूप अनुपात: 3 लंबे : 1 बौना
F1 पीढ़ी में केवल प्रभावी लक्षण दिखाई देता है। F2 पीढ़ी में अप्रभावी लक्षण पुनः प्रकट हो जाता है। इससे स्पष्ट होता है कि अप्रभावी कारक नष्ट नहीं होता, बल्कि प्रभावी कारक की उपस्थिति में उसका प्रभाव दिखाई नहीं देता।
द्विसंकर संकरण (Dihybrid Cross)
जब दो जनकों के बीच दो जोड़ी विपरीत लक्षणों को लेकर संकरण कराया जाता है, तो उसे द्विसंकर संकरण कहते हैं। मेंडल ने बीज के आकार और रंग जैसे लक्षणों का अध्ययन किया।
F1: सभी RrYy (गोल, पीले)
F1 का स्वपरागण: RrYy × RrYy
F2 लक्षण प्रारूप अनुपात: 9 : 3 : 3 : 1
3. मेंडल के वंशागति नियम (Mendel's Laws)
1. प्रभाविता का नियम (Law of Dominance)
जब किसी लक्षण के दो विपरीत कारक एक साथ उपस्थित होते हैं, तो सामान्य पूर्ण प्रभाविता की स्थिति में उनमें से एक कारक अपना प्रभाव प्रकट करता है, जबकि दूसरा कारक छिपा रहता है। प्रभाव दिखाने वाले कारक को प्रभावी तथा छिपे रहने वाले कारक को अप्रभावी कहते हैं।
उदाहरण: मटर के लंबेपन का कारक T, बौनेपन के कारक t पर प्रभावी होता है। इसलिए Tt पौधा लंबा दिखाई देता है।
2. पृथक्करण का नियम (Law of Segregation)
किसी लक्षण के दोनों एलील युग्मक निर्माण के समय एक-दूसरे से अलग हो जाते हैं। इसलिए प्रत्येक युग्मक में किसी जीन के केवल एक एलील की उपस्थिति होती है। निषेचन के समय एलील फिर से जोड़े के रूप में आ जाते हैं। इसे युग्मकों की शुद्धता का नियम भी कहा जाता है।
3. स्वतंत्र अपव्यूहन/स्वतंत्र वर्गीकरण का नियम (Law of Independent Assortment)
दो या अधिक जीनों के एलील युग्मक निर्माण के समय एक-दूसरे से स्वतंत्र रूप से वितरित हो सकते हैं। यह नियम विशेष रूप से उन जीनों पर लागू होता है जो अलग-अलग गुणसूत्रों पर हों या एक ही गुणसूत्र पर पर्याप्त दूरी पर स्थित हों, जहाँ पुनर्संयोजन की संभावना अधिक हो।
| नियम | मुख्य विचार |
|---|---|
| प्रभाविता | विषमयुग्मजी अवस्था में प्रभावी एलील लक्षण को व्यक्त कर सकता है। |
| पृथक्करण | युग्मक निर्माण के समय एलील अलग-अलग हो जाते हैं। |
| स्वतंत्र वर्गीकरण | अलग-अलग जीनों के एलील स्वतंत्र रूप से वितरित हो सकते हैं, यदि वे आनुवंशिक रूप से स्वतंत्र हों। |
4. प्रभाविता एवं अप्रभाविता
प्रभाविता (Dominance) वह स्थिति है जिसमें किसी जीन के दो अलग एलील एक साथ उपस्थित होने पर एक एलील का लक्षण दिखाई देता है और दूसरे का प्रभाव छिप जाता है। प्रभावी एलील को बड़े अक्षर से तथा अप्रभावी एलील को छोटे अक्षर से दर्शाना एक सामान्य आनुवंशिक परंपरा है।
- समयुग्मजी प्रभावी (Homozygous Dominant): TT
- विषमयुग्मजी (Heterozygous): Tt
- समयुग्मजी अप्रभावी (Homozygous Recessive): tt
- जीन प्रारूप (Genotype): किसी जीव के जीन या एलील संयोजन को कहते हैं।
- लक्षण प्रारूप (Phenotype): जीव में दिखाई देने वाले लक्षणों को कहते हैं।
अपूर्ण प्रभाविता (Incomplete Dominance)
इसमें विषमयुग्मजी अवस्था में कोई भी एलील पूर्ण रूप से प्रभावी नहीं होता और मध्यवर्ती लक्षण दिखाई देता है। उदाहरण के लिए स्नैपड्रैगन (Antirrhinum) के लाल और सफेद फूलों के संकरण से F1 में गुलाबी फूल प्राप्त होते हैं।
सह-प्रभाविता (Codominance)
इसमें विषमयुग्मजी अवस्था में दोनों एलील अपना प्रभाव एक साथ व्यक्त करते हैं। मानव ABO रक्त समूह प्रणाली में AB रक्त समूह इसका महत्त्वपूर्ण उदाहरण है, जिसमें Iᴬ और Iᴮ दोनों एलील व्यक्त होते हैं।
5. जीन, DNA एवं RNA
जीन (Gene)
जीन आनुवंशिकता की मूलभूत कार्यात्मक इकाई है। यह DNA का एक विशिष्ट अनुक्रम होता है, जिसमें किसी कार्यात्मक RNA या प्रोटीन के निर्माण से संबंधित सूचना होती है। जीन जीव के अनेक लक्षणों के विकास और नियंत्रण में भूमिका निभाते हैं। सभी जीन सीधे प्रोटीन नहीं बनाते; कुछ जीन कार्यात्मक RNA का निर्माण करते हैं।
DNA (Deoxyribonucleic Acid)
DNA अधिकांश जीवों में आनुवंशिक सूचना का प्रमुख भंडार है। यह न्यूक्लियोटाइड नामक इकाइयों से बना होता है। प्रत्येक न्यूक्लियोटाइड में एक शर्करा, एक फॉस्फेट समूह और एक नाइट्रोजनयुक्त क्षारक होता है। DNA में डीऑक्सीराइबोज शर्करा तथा चार प्रकार के क्षारक पाए जाते हैं।
| क्षारक | पूरा नाम | प्रकार |
|---|---|---|
| A | एडेनिन (Adenine) | प्यूरीन |
| G | ग्वानिन (Guanine) | प्यूरीन |
| C | साइटोसिन (Cytosine) | पिरिमिडीन |
| T | थाइमिन (Thymine) | पिरिमिडीन |
DNA की संरचना
- DNA सामान्यतः दो पॉलीन्यूक्लियोटाइड शृंखलाओं से बना होता है।
- दोनों शृंखलाएँ एक-दूसरे के विपरीत दिशा में होती हैं, जिन्हें प्रतिसमानांतर (Antiparallel) कहते हैं।
- DNA की संरचना द्विकुंडली (Double Helix) होती है।
- एडेनिन थाइमिन के साथ दो हाइड्रोजन बंध बनाता है।
- ग्वानिन साइटोसिन के साथ तीन हाइड्रोजन बंध बनाता है।
- यूकेरियोटिक कोशिकाओं में अधिकांश DNA केंद्रक के गुणसूत्रों में पाया जाता है। माइटोकॉन्ड्रिया और पादपों के हरितलवक में भी DNA होता है।
A–T : 2 हाइड्रोजन बंध
G–C : 3 हाइड्रोजन बंध
RNA (Ribonucleic Acid)
RNA न्यूक्लियोटाइड से बना न्यूक्लिक अम्ल है। इसमें राइबोज शर्करा होती है। RNA में थाइमिन के स्थान पर यूरैसिल पाया जाता है। अधिकांश RNA एकल शृंखलायुक्त होता है, हालांकि कुछ वायरस में RNA की संरचना द्विशृंखलित भी हो सकती है।
| आधार | DNA | RNA |
|---|---|---|
| शर्करा | डीऑक्सीराइबोज | राइबोज |
| क्षारक | A, T, G, C | A, U, G, C |
| सामान्य संरचना | द्विशृंखलित | अधिकांशतः एकल शृंखलित |
| मुख्य भूमिका | आनुवंशिक सूचना का संग्रह एवं स्थानांतरण | प्रोटीन संश्लेषण और जीन अभिव्यक्ति का नियमन |
| स्थिरता | सामान्यतः अधिक स्थिर | सामान्यतः कम स्थिर |
RNA के प्रमुख प्रकार
- mRNA (Messenger RNA): DNA से आनुवंशिक संदेश राइबोसोम तक पहुँचाता है।
- tRNA (Transfer RNA): अमीनो अम्लों को राइबोसोम तक पहुँचाता है।
- rRNA (Ribosomal RNA): राइबोसोम का प्रमुख संरचनात्मक एवं क्रियात्मक घटक है।
6. गुणसूत्र एवं जीन की संरचना
गुणसूत्र (Chromosome) कोशिका में DNA और प्रोटीन से बनी संरचनाएँ हैं, जिनमें आनुवंशिक सूचना व्यवस्थित रहती है। यूकेरियोटिक कोशिकाओं के केंद्रक में DNA हिस्टोन प्रोटीनों के चारों ओर लिपटकर क्रोमैटिन बनाता है। कोशिका विभाजन के समय यह अधिक संघनित होकर स्पष्ट गुणसूत्रों के रूप में दिखाई देता है।
गुणसूत्र के प्रमुख भाग
- क्रोमैटिड (Chromatid): प्रतिकृति के बाद बने गुणसूत्र के दो समान भागों में से प्रत्येक।
- सेंट्रोमियर (Centromere): वह क्षेत्र जहाँ दोनों सहोदर क्रोमैटिड जुड़े रहते हैं और काइनेटोकोर बनता है।
- टेलोमियर (Telomere): गुणसूत्र के सिरों पर स्थित विशेष DNA अनुक्रम, जो सिरों की सुरक्षा में सहायता करता है।
- जीन स्थान (Locus): गुणसूत्र पर किसी जीन का निश्चित स्थान।
- हिस्टोन: DNA को व्यवस्थित एवं पैक करने वाले प्रमुख प्रोटीन।
जीन और एलील में अंतर
जीन DNA का विशिष्ट कार्यात्मक अनुक्रम है, जबकि एलील (Allele) किसी जीन के वैकल्पिक रूप होते हैं। उदाहरण के लिए किसी लक्षण के लिए T और t दो एलील हो सकते हैं। एक द्विगुणित जीव में किसी जीन के दो एलील सामान्यतः समजात गुणसूत्रों पर संबंधित स्थानों पर पाए जाते हैं।
7. मानव में गुणसूत्रों की संख्या
मानव की सामान्य देह कोशिकाएँ द्विगुणित (Diploid) होती हैं। इनमें कुल 46 गुणसूत्र अर्थात् 23 जोड़े पाए जाते हैं। इनमें 22 जोड़े अलिंग गुणसूत्र (Autosomes) और एक जोड़ा लिंग गुणसूत्र (Sex Chromosomes) होता है।
| कोशिका का प्रकार | गुणसूत्रों की संख्या |
|---|---|
| सामान्य मानव देह कोशिका | 46 (23 जोड़े) |
| मानव शुक्राणु | 23 |
| मानव अंडाणु | 23 |
| निषेचन के बाद सामान्य युग्मनज | 46 |
मानव में सामान्य महिला का गुणसूत्रीय संयोजन 46,XX और सामान्य पुरुष का 46,XY होता है। युग्मक निर्माण के समय अर्धसूत्री विभाजन से गुणसूत्रों की संख्या आधी हो जाती है। निषेचन के समय नर और मादा युग्मक के गुणसूत्र मिलकर द्विगुणित संख्या पुनः स्थापित करते हैं।
8. लिंग निर्धारण की प्रक्रिया (Sex Determination)
लिंग निर्धारण वह जैविक प्रक्रिया है जिसके द्वारा किसी जीव का जैविक लिंग निर्धारित होता है। अलग-अलग जीवों में लिंग निर्धारण की प्रणालियाँ अलग हो सकती हैं। मनुष्य में सामान्यतः XX-XY प्रणाली पाई जाती है।
मानव में लिंग निर्धारण
- महिला में सामान्यतः XX लिंग गुणसूत्र होते हैं।
- पुरुष में सामान्यतः XY लिंग गुणसूत्र होते हैं।
- महिला के सभी सामान्य अंडाणुओं में X गुणसूत्र होता है।
- पुरुष के शुक्राणु X या Y गुणसूत्र वाले हो सकते हैं।
- X शुक्राणु और X अंडाणु के मिलने पर सामान्यतः XX संयोजन बनता है।
- Y शुक्राणु और X अंडाणु के मिलने पर सामान्यतः XY संयोजन बनता है।
पिता: XY → X या Y शुक्राणु
X + X = XX
X + Y = XY
इस प्रकार सामान्य XX-XY प्रणाली में संतान के गुणसूत्रीय लिंग निर्धारण में शुक्राणु का X या Y गुणसूत्र महत्त्वपूर्ण होता है। यह प्रक्रिया संयोग पर आधारित होती है।
अन्य जीवों में लिंग निर्धारण
| प्रणाली | उदाहरण | विशेषता |
|---|---|---|
| XX-XY | मनुष्य एवं अनेक स्तनधारी | नर सामान्यतः XY, मादा XX |
| XX-XO | कुछ कीट, जैसे टिड्डे | नर XO और मादा XX |
| ZZ-ZW | पक्षी एवं कुछ सरीसृप | नर ZZ और मादा ZW |
| हैप्लोडिप्लॉइडी | मधुमक्खी, चींटी एवं ततैया के कुछ समूह | निषेचित द्विगुणित अंडों से मादाएँ और अनिषेचित अगुणित अंडों से नर विकसित हो सकते हैं। |
9. मानव में वंशानुगत लक्षण
मनुष्य में अनेक लक्षण जीनों के माध्यम से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचते हैं। कुछ लक्षण मुख्यतः एक जीन से प्रभावित होते हैं, जबकि अनेक लक्षण अनेक जीनों और पर्यावरण के संयुक्त प्रभाव से विकसित होते हैं।
वंशानुगत लक्षणों के उदाहरण
- ABO रक्त समूह।
- Rh रक्त समूह से संबंधित लक्षण।
- कुछ प्रकार के हीमोफीलिया।
- कुछ प्रकार की वर्णांधता।
- सिकल सेल रोग और थैलेसीमिया जैसे आनुवंशिक विकार।
- कुछ आनुवंशिक स्थितियों में बालों, त्वचा एवं आँखों के रंग से संबंधित विशेषताएँ।
मानव में ऊँचाई, त्वचा का रंग और शरीर का भार जैसे अनेक लक्षण बहुजनी (Polygenic) होते हैं। इन पर पोषण, स्वास्थ्य, जीवनशैली तथा पर्यावरण का भी प्रभाव पड़ता है। इसलिए किसी व्यक्ति का प्रत्येक शारीरिक लक्षण केवल एक जीन से निर्धारित नहीं होता।
10. आनुवंशिक विकार (Genetic Disorders)
आनुवंशिक विकार वे स्थितियाँ हैं जो जीन या गुणसूत्रों में परिवर्तन के कारण उत्पन्न होती हैं। कुछ विकार माता-पिता से संतानों में स्थानांतरित होते हैं, जबकि कुछ गुणसूत्रीय त्रुटियों या नए उत्परिवर्तनों के कारण पहली बार भी उत्पन्न हो सकते हैं।
| विकार | मुख्य कारण | प्रमुख विशेषता |
|---|---|---|
| डाउन सिंड्रोम | गुणसूत्र 21 की त्रिसूत्रता (Trisomy 21) | सामान्यतः कुल 47 गुणसूत्र; बौद्धिक एवं विकासात्मक प्रभाव अलग-अलग हो सकते हैं। |
| टर्नर सिंड्रोम | एक X गुणसूत्र का पूर्ण या आंशिक अभाव; सामान्य रूप 45,X | सामान्यतः महिला में पाया जाने वाला गुणसूत्रीय विकार; कम लंबाई और जनन विकास संबंधी समस्याएँ हो सकती हैं। |
| क्लाइनफेल्टर सिंड्रोम | अतिरिक्त X गुणसूत्र; सामान्य रूप 47,XXY | सामान्यतः पुरुष में पाया जाता है; वृषण एवं प्रजनन क्षमता प्रभावित हो सकती है। |
| हीमोफीलिया | रक्त के थक्के बनने से संबंधित कारकों की कमी; सामान्य प्रकार X-सहलग्न अप्रभावी | रक्तस्राव लंबे समय तक हो सकता है। |
| वर्णांधता | रंग पहचान से संबंधित जीन में परिवर्तन; लाल-हरा प्रकार प्रायः X-सहलग्न अप्रभावी | कुछ रंगों, विशेषकर लाल और हरे, में अंतर पहचानने में कठिनाई। |
| सिकल सेल रोग | हीमोग्लोबिन बीटा जीन में परिवर्तन; सामान्यतः ऑटोसोमल अप्रभावी | लाल रक्त कोशिकाएँ हँसिया जैसी हो सकती हैं और रक्त प्रवाह प्रभावित होता है। |
| थैलेसीमिया | हीमोग्लोबिन की अल्फा या बीटा ग्लोबिन शृंखला के निर्माण में आनुवंशिक कमी | एनीमिया और गंभीर स्थितियों में नियमित चिकित्सा की आवश्यकता। |
| फिनाइलकीटोनूरिया (PKU) | सामान्यतः PAH जीन में परिवर्तन | फिनाइलएलानिन के चयापचय में समस्या; समय पर पहचान और उपचार महत्त्वपूर्ण। |
डाउन सिंड्रोम (Down Syndrome)
डाउन सिंड्रोम सामान्यतः गुणसूत्र संख्या 21 की एक अतिरिक्त प्रति के कारण होता है। इसे ट्राइसॉमी-21 कहते हैं। अधिकांश मामलों में गुणसूत्रों की संख्या 47 होती है। यह प्रायः अर्धसूत्री विभाजन के समय गुणसूत्रों के असामान्य पृथक्करण (Nondisjunction) के कारण होता है।
टर्नर सिंड्रोम (Turner Syndrome)
टर्नर सिंड्रोम सामान्यतः एक X गुणसूत्र की पूर्ण या आंशिक कमी से संबंधित है। इसका सामान्य गुणसूत्रीय रूप 45,X होता है। इसमें प्रभावित व्यक्ति सामान्यतः महिला होता है।
क्लाइनफेल्टर सिंड्रोम (Klinefelter Syndrome)
इस स्थिति में सामान्य पुरुष गुणसूत्रीय संयोजन XY के अतिरिक्त एक X गुणसूत्र पाया जाता है। इसका सामान्य रूप 47,XXY है।
हीमोफीलिया एवं वर्णांधता
हीमोफीलिया और लाल-हरा वर्णांधता सामान्यतः X-सहलग्न अप्रभावी वंशागति के उदाहरण हैं। पुरुषों में केवल एक X गुणसूत्र होने के कारण X गुणसूत्र पर उपस्थित अप्रभावी रोगकारी एलील के व्यक्त होने की संभावना अधिक होती है। महिला में सामान्यतः दोनों X गुणसूत्रों पर संबंधित अप्रभावी एलील होने पर रोग व्यक्त होता है, हालांकि X-inactivation और अन्य आनुवंशिक कारणों से कुछ अपवाद संभव हैं।
11. रक्त समूहों की आनुवंशिकता (Blood Group Inheritance)
मानव में ABO रक्त समूह प्रणाली का निर्धारण मुख्यतः एक जीन के तीन एलील Iᴬ, Iᴮ और i द्वारा होता है। Iᴬ और Iᴮ सह-प्रभावी हैं, जबकि दोनों i पर प्रभावी होते हैं। इसलिए ABO प्रणाली बहु-एलीलता (Multiple Allelism) और सह-प्रभाविता का महत्त्वपूर्ण उदाहरण है।
| रक्त समूह | संभावित जीन प्रारूप |
|---|---|
| A | IᴬIᴬ या Iᴬi |
| B | IᴮIᴮ या Iᴮi |
| AB | IᴬIᴮ |
| O | ii |
ABO रक्त समूह की प्रमुख विशेषताएँ
- A और B एलील सह-प्रभावी होते हैं।
- O रक्त समूह का सामान्य जीन प्रारूप ii होता है।
- AB रक्त समूह में Iᴬ और Iᴮ दोनों व्यक्त होते हैं।
- ABO रक्त समूह की खोज कार्ल लैंडस्टीनर ने की थी।
- रक्त आधान में ABO के साथ Rh और अन्य रक्त समूह प्रणालियों का मिलान भी महत्त्वपूर्ण है।
Rh रक्त समूह
Rh रक्त समूह प्रणाली में D एंटीजन का विशेष महत्त्व है। लाल रक्त कोशिकाओं पर D एंटीजन उपस्थित होने पर व्यक्ति को सामान्यतः Rh-पॉजिटिव तथा अनुपस्थित होने पर Rh-नेगेटिव कहा जाता है। Rh प्रणाली का आनुवंशिक नियंत्रण जटिल है, लेकिन सामान्य परीक्षा स्तर पर D एंटीजन की उपस्थिति या अनुपस्थिति को आधार माना जाता है।
12. DNA प्रतिकृति एवं प्रोटीन संश्लेषण
DNA प्रतिकृति (DNA Replication)
DNA प्रतिकृति वह प्रक्रिया है जिसमें एक DNA अणु से उसकी समान आनुवंशिक सूचना वाले दो DNA अणु बनते हैं। यह कोशिका विभाजन से पहले होती है, ताकि बनने वाली संतति कोशिकाओं को आनुवंशिक सूचना मिल सके।
DNA प्रतिकृति अर्ध-संरक्षी (Semi-conservative) होती है। इसमें प्रत्येक नए DNA अणु में एक पुरानी मूल शृंखला और एक नई निर्मित शृंखला होती है।
DNA प्रतिकृति में प्रमुख एंजाइम
| एंजाइम | कार्य |
|---|---|
| हेलिकेज (Helicase) | DNA की दोनों शृंखलाओं को अलग करता है। |
| टोपोआइसोमेरेज (Topoisomerase) | DNA के खुलने पर उत्पन्न तनाव को कम करता है। |
| प्राइमेज (Primase) | RNA प्राइमर बनाता है। |
| DNA पॉलिमरेज | न्यूक्लियोटाइड जोड़कर नई DNA शृंखला बनाता है। |
| DNA लाइगेज (Ligase) | DNA के टुकड़ों को जोड़ता है। |
प्रोटीन संश्लेषण (Protein Synthesis)
प्रोटीन संश्लेषण वह प्रक्रिया है जिसमें DNA में मौजूद आनुवंशिक सूचना के आधार पर अमीनो अम्लों की निश्चित क्रम वाली शृंखला बनती है। इसे सामान्यतः दो प्रमुख चरणों में समझा जाता है।
1. अनुलेखन (Transcription): DNA के एक टेम्पलेट शृंखला के आधार पर RNA, विशेषकर mRNA, का निर्माण होता है। यूकेरियोटिक कोशिकाओं में यह प्रक्रिया मुख्यतः केंद्रक में होती है।
2. अनुवादन (Translation): mRNA में उपस्थित कोडॉन के आधार पर राइबोसोम पर अमीनो अम्लों को जोड़कर पॉलीपेप्टाइड शृंखला बनती है। tRNA अमीनो अम्लों को राइबोसोम तक पहुँचाता है।
Replication → Transcription → Translation
आनुवंशिक कूट (Genetic Code)
- तीन न्यूक्लियोटाइड का समूह एक कोडॉन कहलाता है।
- कुल 64 संभावित कोडॉन होते हैं।
- 61 कोडॉन अमीनो अम्लों के लिए संकेत करते हैं।
- तीन स्टॉप कोडॉन UAA, UAG और UGA हैं।
- AUG सामान्य प्रारंभ कोडॉन है और मेथियोनीन के लिए संकेत करता है।
- आनुवंशिक कूट लगभग सार्वभौमिक, अपह्रासित (Degenerate) और विशिष्ट (Unambiguous) होता है; कुछ अपवाद पाए जाते हैं।
13. उत्परिवर्तन (Mutation)
DNA या गुणसूत्रों के आनुवंशिक पदार्थ में होने वाला स्थायी परिवर्तन उत्परिवर्तन कहलाता है। यह परिवर्तन जीन के न्यूक्लियोटाइड अनुक्रम, गुणसूत्र की संरचना या गुणसूत्रों की संख्या में हो सकता है। उत्परिवर्तन प्राकृतिक रूप से भी हो सकता है और कुछ भौतिक या रासायनिक कारकों से इसकी दर बढ़ सकती है।
उत्परिवर्तन के प्रमुख प्रकार
| प्रकार | अर्थ/उदाहरण |
|---|---|
| बिंदु उत्परिवर्तन (Point Mutation) | DNA के एक या कुछ न्यूक्लियोटाइड में परिवर्तन। |
| प्रतिस्थापन (Substitution) | एक न्यूक्लियोटाइड के स्थान पर दूसरा न्यूक्लियोटाइड आना। |
| विलोपन (Deletion) | एक या अधिक न्यूक्लियोटाइड का हट जाना। |
| प्रवेशन (Insertion) | एक या अधिक न्यूक्लियोटाइड का जुड़ जाना। |
| फ्रेमशिफ्ट उत्परिवर्तन | तीन के गुणज में न होने वाले न्यूक्लियोटाइड के जुड़ने या हटने से पढ़ने का फ्रेम बदलना। |
| गुणसूत्रीय संरचनात्मक परिवर्तन | विलोपन, द्विगुणन, प्रतिलोमन या स्थानांतरण। |
| संख्यात्मक परिवर्तन | एक या अधिक गुणसूत्रों की संख्या में परिवर्तन, जैसे ट्राइसॉमी। |
उत्परिवर्तन के कारण
- पराबैंगनी किरणें (UV Rays)।
- एक्स-किरणें एवं अन्य आयनीकरण विकिरण।
- कुछ रासायनिक पदार्थ।
- DNA प्रतिकृति के समय होने वाली त्रुटियाँ।
- कुछ जैविक कारक, जैसे कुछ वायरस एवं ट्रांसपोजेबल तत्व।
उत्परिवर्तन लाभदायक, हानिकारक या तटस्थ हो सकता है। जनन कोशिकाओं में उत्पन्न उत्परिवर्तन अगली पीढ़ी तक पहुँच सकते हैं। सामान्यतः केवल शरीर की कोशिकाओं में हुए उत्परिवर्तन संतानों में वंशानुगत रूप से नहीं पहुँचते।
14. जैव विकास की अवधारणा (Concept of Evolution)
जैव विकास (Evolution) वह प्रक्रिया है जिसमें जीवों की आबादियों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी आनुवंशिक परिवर्तन होते हैं। लंबे समय में इन परिवर्तनों से नई अनुकूलन विशेषताएँ विकसित हो सकती हैं और कभी-कभी नई प्रजातियों का निर्माण भी हो सकता है।
आधुनिक विकासवादी जीव विज्ञान के अनुसार प्राकृतिक चयन, उत्परिवर्तन, आनुवंशिक विचलन (Genetic Drift), जीन प्रवाह (Gene Flow) तथा पुनर्संयोजन जैसी प्रक्रियाएँ आबादियों की आनुवंशिक संरचना को बदलती हैं।
जैव विकास के प्रमुख आधार
- जीवों में आनुवंशिक विविधता मौजूद होती है।
- कुछ विविधताएँ वंशानुगत होती हैं।
- पर्यावरण में उपलब्ध संसाधन सीमित हो सकते हैं।
- कुछ आनुवंशिक लक्षण जीवों की प्रजनन सफलता बढ़ाते हैं।
- लंबे समय में आबादी की आनुवंशिक संरचना बदल सकती है।
15. लैमार्कवाद एवं डार्विनवाद
लैमार्कवाद (Lamarckism)
जीन बैप्टिस्ट लैमार्क ने 1809 में अपनी पुस्तक Philosophie Zoologique में जैव विकास के संबंध में विचार प्रस्तुत किए। उनके सिद्धांत को अर्जित लक्षणों की वंशागति का सिद्धांत भी कहा जाता है। लैमार्क के अनुसार अंगों का अधिक उपयोग उन्हें विकसित करता है और कम उपयोग से उनका ह्रास हो सकता है। उन्होंने माना कि जीवनकाल में अर्जित कुछ लक्षण संतानों में पहुँच सकते हैं।
उदाहरण के रूप में जिराफ की लंबी गर्दन की व्याख्या लैमार्कवाद में लगातार ऊँची पत्तियाँ खाने के प्रयास से गर्दन लंबी होने और इस अर्जित लक्षण के अगली पीढ़ी में पहुँचने के रूप में की जाती थी। आधुनिक आनुवंशिकी के अनुसार इस व्याख्या को जिराफ की लंबी गर्दन के विकास का पर्याप्त वैज्ञानिक आधार नहीं माना जाता।
डार्विनवाद (Darwinism)
चार्ल्स डार्विन ने प्राकृतिक चयन के सिद्धांत को व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत किया। उनकी प्रसिद्ध पुस्तक On the Origin of Species 1859 में प्रकाशित हुई। अल्फ्रेड रसेल वॉलेस ने भी स्वतंत्र रूप से प्राकृतिक चयन से संबंधित विचार विकसित किए।
डार्विन के अनुसार किसी आबादी में पहले से मौजूद विविधताओं के कारण कुछ जीव पर्यावरण में अधिक सफल हो सकते हैं। ऐसे जीवों के जीवित रहने और प्रजनन करने की संभावना अधिक हो सकती है। समय के साथ उनके वंशानुगत लक्षण आबादी में अधिक सामान्य हो सकते हैं।
| आधार | लैमार्कवाद | डार्विनवाद |
|---|---|---|
| मुख्य विचार | उपयोग एवं अनुपयोग तथा अर्जित लक्षणों की वंशागति | प्राकृतिक चयन द्वारा अनुकूल विविधताओं का प्रसार |
| विविधता | पर्यावरण एवं आवश्यकताओं से संबंधित परिवर्तन पर बल | जीवों में पहले से मौजूद विविधताओं पर बल |
| प्राकृतिक चयन | मुख्य आधार नहीं | मुख्य आधार |
| प्रमुख वैज्ञानिक | जीन बैप्टिस्ट लैमार्क | चार्ल्स डार्विन; वॉलेस का स्वतंत्र योगदान |
16. प्राकृतिक चयन एवं योग्यतम की उत्तरजीविता
प्राकृतिक चयन (Natural Selection) वह प्रक्रिया है जिसमें किसी आबादी के ऐसे वंशानुगत लक्षण, जो विशेष पर्यावरण में जीवों की जीवित रहने और प्रजनन करने की सफलता बढ़ाते हैं, अगली पीढ़ियों में अधिक सामान्य हो सकते हैं।
योग्यतम की उत्तरजीविता (Survival of the Fittest) का अर्थ केवल सबसे शक्तिशाली या सबसे तेज जीव का जीवित रहना नहीं है। इसका अर्थ है कि किसी विशेष पर्यावरण में जिन जीवों की प्रजनन सफलता अधिक होती है, उनके वंशानुगत लक्षण अगली पीढ़ियों में अधिक फैल सकते हैं।
प्राकृतिक चयन के प्रमुख उदाहरण
- औद्योगिक कृष्णता (Industrial Melanism): औद्योगिक क्षेत्रों में पेड़ों की सतह के रंग में बदलाव के साथ पेपर्ड मॉथ की आबादी में रंग संबंधी परिवर्तन का उदाहरण।
- एंटीबायोटिक प्रतिरोध: जीवाणुओं की आबादी में प्रतिरोधी आनुवंशिक विविधता वाले जीवाणु एंटीबायोटिक के संपर्क में चयनित हो सकते हैं।
- कीटनाशक प्रतिरोध: कुछ कीट आबादियों में कीटनाशक के प्रति प्रतिरोधी लक्षणों का बढ़ना।
- फिंच पक्षियों की चोंच: गैलापागोस द्वीपों के फिंच पक्षियों में भोजन की उपलब्धता के अनुसार चोंच के आकार में विविधता और चयन।
17. जीवाश्म एवं विकास के प्रमाण
जीवाश्म (Fossils) प्राचीन जीवों के संरक्षित अवशेष, छाप या गतिविधियों के प्रमाण हैं। ये सामान्यतः अवसादी चट्टानों में पाए जाते हैं। जीवाश्मों का अध्ययन जीवाश्म विज्ञान (Palaeontology) कहलाता है। इनके माध्यम से पृथ्वी पर पुराने जीवों, उनके विलुप्त होने तथा समय के साथ जीवों में हुए परिवर्तनों का अध्ययन किया जाता है।
जैव विकास के प्रमुख प्रमाण
| प्रमाण | अर्थ | उदाहरण |
|---|---|---|
| जीवाश्मीय प्रमाण | प्राचीन जीवों के अवशेष एवं छाप | आर्कियोप्टेरिक्स |
| समजात अंग (Homologous Organs) | मूल संरचना एवं विकासीय उत्पत्ति समान, लेकिन कार्य अलग हो सकते हैं | मनुष्य का हाथ, चमगादड़ का अग्रपाद, व्हेल का फ्लिपर |
| समरूप अंग (Analogous Organs) | कार्य समान, लेकिन संरचना एवं विकासीय उत्पत्ति अलग | पक्षी के पंख और कीट के पंख |
| अवशेषी अंग (Vestigial Organs) | पूर्वजों में अधिक उपयोगी रहे अंगों के घटे हुए अवशेष | मानव में अपेंडिक्स का अवशेषी महत्त्व; पूँछ की हड्डी |
| भ्रूणीय प्रमाण | विभिन्न जीवों के भ्रूणीय विकास में कुछ समानताएँ | कशेरुकी भ्रूणों में प्रारंभिक विकास की कुछ समानताएँ |
| आणविक प्रमाण | DNA, RNA और प्रोटीन अनुक्रमों की तुलना | संबंधित प्रजातियों में आनुवंशिक समानता |
समजात एवं समरूप अंग में अंतर
समजात अंग: इनकी मूल संरचना और विकासीय उत्पत्ति समान होती है, लेकिन कार्य अलग-अलग हो सकते हैं। ये अपसारी विकास (Divergent Evolution) का प्रमाण हैं।
समरूप अंग: इनका कार्य समान होता है, लेकिन संरचना और विकासीय उत्पत्ति अलग हो सकती है। ये अभिसारी विकास (Convergent Evolution) का उदाहरण हैं।
आर्कियोप्टेरिक्स (Archaeopteryx)
आर्कियोप्टेरिक्स एक प्रसिद्ध जीवाश्म है जिसमें सरीसृपों और पक्षियों से संबंधित विशेषताओं का मिश्रण पाया गया। इसे पक्षियों के विकास के अध्ययन में महत्त्वपूर्ण संक्रमणीय जीवाश्म माना जाता है।
18. जैव प्रौद्योगिकी का परिचय (Biotechnology)
जैव प्रौद्योगिकी वह तकनीक है जिसमें जीवों, कोशिकाओं, एंजाइमों या जैविक प्रणालियों का उपयोग करके मानव उपयोग के उत्पादों एवं प्रक्रियाओं का विकास किया जाता है। इसका उपयोग चिकित्सा, कृषि, उद्योग, खाद्य उत्पादन, पर्यावरण संरक्षण और अनुसंधान में किया जाता है।
जैव प्रौद्योगिकी के प्रमुख उपयोग
- इंसुलिन एवं अन्य चिकित्सकीय प्रोटीन का उत्पादन।
- टीकों का विकास एवं निर्माण।
- रोगों की आणविक जाँच।
- रोग प्रतिरोधी एवं बेहतर फसल किस्मों का विकास।
- ऊतक संवर्धन द्वारा पौधों का तीव्र प्रवर्धन।
- जैव ईंधन एवं औद्योगिक एंजाइमों का उत्पादन।
- अपशिष्ट उपचार और जैव उपचार (Bioremediation)।
पारंपरिक एवं आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी
| पारंपरिक जैव प्रौद्योगिकी | आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी |
|---|---|
| किण्वन द्वारा दही, पनीर एवं ब्रेड निर्माण | पुनर्संयोजक DNA तकनीक |
| चयनात्मक प्रजनन | जीन संपादन एवं आनुवंशिक अभियांत्रिकी |
| सूक्ष्मजीवों का पारंपरिक उपयोग | PCR, DNA अनुक्रमण एवं आणविक निदान |
| पारंपरिक ऊतक संवर्धन के कुछ तरीके | स्टेम सेल तकनीक एवं आधुनिक कोशिका अभियांत्रिकी |
19. आनुवंशिक अभियांत्रिकी, क्लोनिंग एवं DNA फिंगरप्रिंटिंग
आनुवंशिक अभियांत्रिकी (Genetic Engineering)
आनुवंशिक अभियांत्रिकी में किसी जीव के DNA या जीन में वैज्ञानिक तरीके से परिवर्तन किया जाता है। इसमें किसी उपयोगी जीन को अलग करना, उसे उपयुक्त वाहक (Vector) में जोड़ना और इच्छित कोशिका में पहुँचाना शामिल हो सकता है।
पुनर्संयोजक DNA तकनीक (Recombinant DNA Technology)
इस तकनीक में अलग-अलग स्रोतों के DNA खंडों को जोड़कर नया DNA अणु बनाया जाता है। सामान्य प्रक्रिया में इच्छित जीन को अलग करना, प्रतिबंधन एंजाइम (Restriction Enzyme) से DNA काटना, DNA लाइगेज द्वारा जोड़ना, वेक्टर में डालना और उपयुक्त पोषक कोशिका में उसका प्रवर्धन करना शामिल है।
प्रमुख उपकरण एवं एंजाइम
| उपकरण/एंजाइम | कार्य |
|---|---|
| Restriction Endonuclease | DNA को विशिष्ट पहचान अनुक्रमों पर काटता है। |
| DNA Ligase | DNA खंडों को जोड़ता है। |
| DNA Polymerase | DNA शृंखला का निर्माण करता है। |
| Plasmid | जीवाणुओं में पाया जाने वाला छोटा, सामान्यतः वृत्ताकार अतिरिक्त गुणसूत्रीय DNA; वेक्टर के रूप में उपयोग हो सकता है। |
| Vector | इच्छित DNA को पोषक कोशिका तक पहुँचाने का माध्यम। |
| Host Cell | वह कोशिका जिसमें पुनर्संयोजक DNA पहुँचाया जाता है। |
क्लोनिंग (Cloning)
क्लोनिंग वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा आनुवंशिक रूप से समान या लगभग समान DNA, कोशिका या जीव की प्रतियाँ तैयार की जाती हैं। क्लोनिंग के विभिन्न प्रकार होते हैं:
- जीन क्लोनिंग: किसी विशेष DNA खंड की अनेक प्रतियाँ बनाना।
- कोशिका क्लोनिंग: किसी कोशिका से समान कोशिकाओं का समूह तैयार करना।
- प्रजनन क्लोनिंग: किसी जीव के समान आनुवंशिक संरचना वाला नया जीव विकसित करना।
- चिकित्सीय क्लोनिंग: अनुसंधान एवं संभावित चिकित्सकीय उपयोग के लिए कोशिकाएँ या ऊतक प्राप्त करने का उद्देश्य।
डॉली भेड़ (Dolly Sheep)
डॉली भेड़ को 1996 में स्कॉटलैंड के रोसलिन संस्थान में विकसित किया गया था और 1997 में इसकी जानकारी प्रकाशित हुई। यह वयस्क देह कोशिका के केंद्रक स्थानांतरण (Somatic Cell Nuclear Transfer – SCNT) से उत्पन्न पहला प्रसिद्ध स्तनधारी क्लोन था। इसमें वयस्क भेड़ की स्तन ग्रंथि कोशिका के केंद्रक का उपयोग किया गया।
DNA फिंगरप्रिंटिंग (DNA Fingerprinting)
DNA फिंगरप्रिंटिंग ऐसी तकनीक है जिसमें व्यक्ति के DNA के कुछ अत्यधिक परिवर्तनशील क्षेत्रों का विश्लेषण करके उसकी पहचान या जैविक संबंधों का अनुमान लगाया जाता है। आधुनिक फॉरेंसिक परीक्षणों में सामान्यतः STR (Short Tandem Repeats) जैसे DNA मार्करों का उपयोग किया जाता है।
DNA फिंगरप्रिंटिंग के उपयोग
- अपराध अनुसंधान में जैविक नमूनों की पहचान।
- पितृत्व एवं पारिवारिक संबंधों की जाँच।
- अज्ञात शवों की पहचान।
- लापता व्यक्तियों की पहचान में सहायता।
- जनसंख्या एवं विकासवादी आनुवंशिकी का अध्ययन।
20. PCR, DNA रिकॉम्बिनेंट तकनीक, स्टेम सेल एवं जीन थेरेपी
PCR (Polymerase Chain Reaction)
PCR एक प्रयोगशाला तकनीक है जिसके द्वारा DNA के किसी विशेष खंड की बहुत बड़ी संख्या में प्रतियाँ बनाई जाती हैं। इसे DNA प्रवर्धन (DNA Amplification) भी कहते हैं। इस तकनीक का विकास कैरी मुलिस ने किया था।
PCR के तीन प्रमुख चरण
| चरण | सामान्य तापमान | प्रक्रिया |
|---|---|---|
| डिनैचुरेशन (Denaturation) | लगभग 94–98°C | DNA की दोनों शृंखलाएँ अलग होती हैं। |
| एनीलिंग (Annealing) | लगभग 50–65°C | प्राइमर लक्ष्य DNA अनुक्रमों से जुड़ते हैं। |
| एक्सटेंशन (Extension) | लगभग 72°C | DNA पॉलिमरेज नए DNA खंड बनाता है। |
PCR में सामान्यतः ताप-सहिष्णु Taq DNA Polymerase का उपयोग किया जाता है। यह एंजाइम Thermus aquaticus नामक जीवाणु से प्राप्त किया गया था। PCR के कई चक्रों के बाद लक्ष्य DNA की प्रतियाँ तेजी से बढ़ जाती हैं।
स्टेम सेल (Stem Cells)
स्टेम सेल ऐसी अविभेदित या कम विभेदित कोशिकाएँ हैं जिनमें स्वयं का नवीकरण (Self-renewal) तथा उपयुक्त परिस्थितियों में विभिन्न प्रकार की कोशिकाओं में विभेदित होने की क्षमता होती है। इनका उपयोग विकास जीव विज्ञान, रोग अनुसंधान और पुनर्योजी चिकित्सा के अध्ययन में किया जाता है।
स्टेम सेल के प्रमुख प्रकार
| प्रकार | विशेषता |
|---|---|
| टोटीपोटेंट (Totipotent) | उचित परिस्थितियों में भ्रूणीय एवं अतिरिक्त भ्रूणीय ऊतकों सहित पूर्ण जीव के निर्माण की क्षमता। |
| प्लूरीपोटेंट (Pluripotent) | शरीर की लगभग सभी कोशिका प्रकारों में विभेदित होने की क्षमता, लेकिन सामान्यतः पूर्ण जीव नहीं बना सकते। |
| मल्टीपोटेंट (Multipotent) | सीमित संबंधित कोशिका प्रकारों में विभेदित होने की क्षमता। |
| यूनिपोटेंट (Unipotent) | मुख्यतः एक ही कोशिका प्रकार में विभेदित होने की क्षमता, लेकिन स्वयं का नवीकरण कर सकते हैं। |
जीन थेरेपी (Gene Therapy)
जीन थेरेपी ऐसी चिकित्सकीय तकनीक है जिसमें रोग के उपचार या नियंत्रण के उद्देश्य से कोशिकाओं के आनुवंशिक पदार्थ में परिवर्तन किया जाता है। इसमें कार्यात्मक जीन पहुँचाना, दोषपूर्ण जीन को निष्क्रिय करना या जीन संपादन जैसी रणनीतियाँ शामिल हो सकती हैं।
जीन थेरेपी का उपयोग कुछ आनुवंशिक रोगों, रक्त संबंधी विकारों और कुछ प्रकार के कैंसर के उपचार में किया जा रहा है। इसकी सफलता रोग, तकनीक, रोगी की स्थिति तथा नियामकीय स्वीकृति पर निर्भर करती है।
जीन थेरेपी के प्रमुख प्रकार
- सोमैटिक जीन थेरेपी: शरीर की सामान्य कोशिकाओं में आनुवंशिक परिवर्तन किया जाता है। इसका परिवर्तन सामान्यतः अगली पीढ़ी में वंशानुगत रूप से नहीं पहुँचता।
- जर्मलाइन जीन थेरेपी: जनन कोशिकाओं या भ्रूण के आनुवंशिक पदार्थ में परिवर्तन। इसके प्रभाव अगली पीढ़ियों तक जा सकते हैं; मानव में इसके नैतिक एवं कानूनी प्रश्न अत्यंत गंभीर हैं।
- Ex vivo: रोगी की कोशिकाएँ शरीर से बाहर निकालकर उनमें आनुवंशिक परिवर्तन किया जाता है और फिर वापस पहुँचाया जाता है।
- In vivo: आनुवंशिक पदार्थ सीधे शरीर के भीतर लक्ष्य कोशिकाओं तक पहुँचाया जाता है।
अध्याय के प्रमुख वैज्ञानिक तथ्य – एक नजर में
| प्रश्न/तथ्य | उत्तर |
|---|---|
| आनुवंशिकी का जनक | ग्रेगर जॉन मेंडल |
| मेंडल ने किस पौधे पर प्रयोग किए? | मटर (Pisum sativum) |
| मेंडल के प्रयोगों के परिणाम प्रकाशित हुए | 1866 |
| Genetics शब्द का प्रयोग | विलियम बेटसन, 1905 |
| न्यूक्लिन की खोज | फ्रेडरिक मीशर |
| DNA की द्विकुंडली संरचना का मॉडल | वाटसन एवं क्रिक, 1953 |
| DNA प्रतिकृति का प्रकार | अर्ध-संरक्षी |
| DNA में थाइमिन का पूरक | एडेनिन |
| DNA में ग्वानिन का पूरक | साइटोसिन |
| RNA में थाइमिन के स्थान पर | यूरैसिल |
| मानव में गुणसूत्र | 46 (23 जोड़े) |
| मानव युग्मक में गुणसूत्र | 23 |
| डाउन सिंड्रोम | ट्राइसॉमी 21 |
| टर्नर सिंड्रोम | 45,X |
| क्लाइनफेल्टर सिंड्रोम | 47,XXY |
| ABO रक्त समूह प्रणाली की खोज | कार्ल लैंडस्टीनर |
| ABO प्रणाली में एलील | Iᴬ, Iᴮ और i |
| हीमोफीलिया का सामान्य वंशागति प्रकार | X-सहलग्न अप्रभावी |
| लाल-हरा वर्णांधता का सामान्य वंशागति प्रकार | X-सहलग्न अप्रभावी |
| लैमार्क की पुस्तक | Philosophie Zoologique (1809) |
| डार्विन की पुस्तक | On the Origin of Species (1859) |
| जीवाश्मों का अध्ययन | जीवाश्म विज्ञान (Palaeontology) |
| प्राकृतिक चयन का सिद्धांत | चार्ल्स डार्विन एवं स्वतंत्र रूप से अल्फ्रेड रसेल वॉलेस |
| PCR के विकास से संबंधित वैज्ञानिक | कैरी मुलिस |
| Taq Polymerase का स्रोत | Thermus aquaticus |
| डॉली भेड़ | वयस्क देह कोशिका के केंद्रक स्थानांतरण से क्लोन किया गया स्तनधारी |
| DNA फिंगरप्रिंटिंग के आधुनिक मार्कर | STR सहित परिवर्ती DNA अनुक्रम |
महत्त्वपूर्ण बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)
निर्देश: पहले स्वयं प्रश्न हल करें। फिर View Answer पर क्लिक करके सही उत्तर एवं व्याख्या देखें। ये प्रश्न मौलिक अभ्यास प्रश्न हैं; इन्हें किसी परीक्षा के वास्तविक PYQ के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया है।
(A) चार्ल्स डार्विन
(B) ग्रेगर जॉन मेंडल
(C) लैमार्क
(D) रॉबर्ट हुक
View Answer / उत्तर देखें
मटर के पौधे पर संकरण प्रयोगों के आधार पर मेंडल ने वंशागति के मूल नियम प्रस्तुत किए।
(A) गेहूँ
(B) मटर
(C) मक्का
(D) चना
View Answer / उत्तर देखें
मेंडल ने Pisum sativum अर्थात् मटर के पौधे पर प्रयोग किए थे।
(A) 1:1
(B) 2:1
(C) 3:1
(D) 9:3:3:1
View Answer / उत्तर देखें
पूर्ण प्रभाविता की स्थिति में F2 पीढ़ी में तीन प्रभावी लक्षण और एक अप्रभावी लक्षण दिखाई देता है।
(A) 3:1
(B) 1:2:1
(C) 9:3:3:1
(D) 1:1
View Answer / उत्तर देखें
TT:Tt:tt का अनुपात 1:2:1 होता है।
(A) 3:1
(B) 1:2:1
(C) 9:3:3:1
(D) 1:1:1:1
View Answer / उत्तर देखें
यह अनुपात स्वतंत्र वर्गीकरण और पूर्ण प्रभाविता की सामान्य परिस्थितियों में प्राप्त होता है।
(A) युग्मक निर्माण के समय एलील का अलग होना
(B) DNA का नष्ट होना
(C) कोशिका का आकार बढ़ना
(D) प्रोटीन का पाचन
View Answer / उत्तर देखें
किसी जीन के दोनों एलील अलग होकर अलग-अलग युग्मकों में जाते हैं।
(A) विलियम बेटसन
(B) मेंडल
(C) वाटसन
(D) क्रिक
View Answer / उत्तर देखें
विलियम बेटसन ने Genetics शब्द को वैज्ञानिक उपयोग में लाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
(A) डार्विन एवं लैमार्क
(B) वाटसन एवं क्रिक
(C) मेंडल एवं मॉर्गन
(D) ग्रिफिथ एवं एवरी
View Answer / उत्तर देखें
1953 में जेम्स वाटसन और फ्रांसिस क्रिक ने DNA की द्विकुंडली संरचना का मॉडल प्रस्तुत किया।
(A) राइबोज
(B) डीऑक्सीराइबोज
(C) ग्लूकोज
(D) फ्रक्टोज
View Answer / उत्तर देखें
DNA में डीऑक्सीराइबोज तथा RNA में राइबोज शर्करा होती है।
(A) एडेनिन
(B) ग्वानिन
(C) यूरैसिल
(D) साइटोसिन
View Answer / उत्तर देखें
RNA में A, U, G और C क्षारक पाए जाते हैं।
(A) ग्वानिन
(B) साइटोसिन
(C) थाइमिन
(D) यूरैसिल
View Answer / उत्तर देखें
द्विशृंखलित DNA में A–T के बीच दो हाइड्रोजन बंध बनते हैं।
(A) एक
(B) दो
(C) तीन
(D) चार
View Answer / उत्तर देखें
G–C क्षारक युग्म के बीच तीन हाइड्रोजन बंध होते हैं।
(A) 23
(B) 44
(C) 46
(D) 48
View Answer / उत्तर देखें
मानव की सामान्य देह कोशिका में 23 जोड़े गुणसूत्र होते हैं।
(A) 22
(B) 23
(C) 44
(D) 46
View Answer / उत्तर देखें
शुक्राणु और अंडाणु दोनों में सामान्यतः 23 गुणसूत्र होते हैं।
(A) 13
(B) 18
(C) 21
(D) 23
View Answer / उत्तर देखें
डाउन सिंड्रोम को ट्राइसॉमी-21 कहा जाता है।
(A) 47,XXY
(B) 45,X
(C) 47,+21
(D) 46,XY
View Answer / उत्तर देखें
टर्नर सिंड्रोम में एक X गुणसूत्र की पूर्ण या आंशिक कमी होती है।
(A) 45,X
(B) 47,XXY
(C) 47,+21
(D) 46,XX
View Answer / उत्तर देखें
क्लाइनफेल्टर सिंड्रोम में सामान्यतः एक अतिरिक्त X गुणसूत्र होता है।
(A) Y-सहलग्न प्रभावी
(B) X-सहलग्न अप्रभावी
(C) ऑटोसोमल प्रभावी
(D) माइटोकॉन्ड्रियल
View Answer / उत्तर देखें
हीमोफीलिया के सामान्य प्रकार X गुणसूत्र पर स्थित अप्रभावी जीन से संबंधित होते हैं।
(A) मेंडल
(B) कार्ल लैंडस्टीनर
(C) डार्विन
(D) मॉर्गन
View Answer / उत्तर देखें
कार्ल लैंडस्टीनर ने 1900 के आसपास ABO रक्त समूह प्रणाली की खोज की।
(A) अपूर्ण प्रभाविता
(B) सह-प्रभाविता
(C) उत्परिवर्तन
(D) बहुगुणिता
View Answer / उत्तर देखें
AB रक्त समूह में Iᴬ और Iᴮ दोनों एलील व्यक्त होते हैं।
(A) पूर्ण संरक्षी
(B) अर्ध-संरक्षी
(C) असंरक्षी
(D) अनियमित
View Answer / उत्तर देखें
प्रत्येक नए DNA अणु में एक पुरानी और एक नई शृंखला होती है।
(A) लाइगेज
(B) हेलिकेज
(C) एमाइलेज
(D) पेप्सिन
View Answer / उत्तर देखें
हेलिकेज DNA की दोनों शृंखलाओं को अलग करता है।
(A) DNA लाइगेज
(B) हेलिकेज
(C) लाइपेज
(D) ट्रिप्सिन
View Answer / उत्तर देखें
DNA लाइगेज DNA खंडों के बीच फॉस्फोडाइएस्टर बंध बनाकर उन्हें जोड़ता है।
(A) अमीनो अम्लों का पाचन
(B) आनुवंशिक संदेश राइबोसोम तक पहुँचाना
(C) DNA को नष्ट करना
(D) ऊर्जा संग्रह करना
View Answer / उत्तर देखें
mRNA DNA से प्राप्त संदेश को राइबोसोम तक ले जाता है।
(A) mRNA
(B) tRNA
(C) DNA
(D) rRNA अकेले
View Answer / उत्तर देखें
tRNA विशिष्ट अमीनो अम्लों को राइबोसोम तक पहुँचाता है।
(A) स्टॉप कोडॉन
(B) प्रारंभ कोडॉन एवं मेथियोनीन
(C) केवल ग्लाइसिन
(D) DNA प्रतिकृति
View Answer / उत्तर देखें
AUG सामान्य प्रारंभ कोडॉन है और मेथियोनीन के लिए संकेत करता है।
(A) DNA या गुणसूत्रों में स्थायी आनुवंशिक परिवर्तन
(B) केवल कोशिका का आकार बढ़ना
(C) भोजन का पाचन
(D) रक्त का जमना
View Answer / उत्तर देखें
उत्परिवर्तन जीन या गुणसूत्रों की संरचना अथवा संख्या में परिवर्तन हो सकता है।
(A) अर्जित लक्षणों की वंशागति
(B) DNA फिंगरप्रिंटिंग
(C) प्राकृतिक चयन ही एकमात्र कारण
(D) गुणसूत्रों की संख्या स्थिर नहीं रहती
View Answer / उत्तर देखें
लैमार्क ने उपयोग एवं अनुपयोग और अर्जित लक्षणों की वंशागति पर बल दिया।
(A) लैमार्क
(B) चार्ल्स डार्विन
(C) मेंडल
(D) वाटसन
View Answer / उत्तर देखें
यह पुस्तक 1859 में प्रकाशित हुई थी।
(A) चार्ल्स डार्विन
(B) रॉबर्ट हुक
(C) लुई पाश्चर
(D) रॉबर्ट कोच
View Answer / उत्तर देखें
अल्फ्रेड रसेल वॉलेस ने भी स्वतंत्र रूप से प्राकृतिक चयन का विचार प्रस्तुत किया था।
(A) पारिस्थितिकी
(B) जीवाश्म विज्ञान
(C) कोशिका विज्ञान
(D) आनुवंशिकी
View Answer / उत्तर देखें
जीवाश्मों का अध्ययन Palaeontology कहलाता है।
(A) अभिसारी विकास
(B) अपसारी विकास
(C) केवल उत्परिवर्तन
(D) कृत्रिम चयन
View Answer / उत्तर देखें
समजात अंगों की मूल संरचना समान होती है, लेकिन कार्य अलग हो सकते हैं।
(A) अभिसारी विकास
(B) अपसारी विकास
(C) केवल सह-प्रभाविता
(D) अर्धसूत्री विभाजन
View Answer / उत्तर देखें
समरूप अंगों का कार्य समान, लेकिन विकासीय उत्पत्ति अलग हो सकती है।
(A) स्तनधारी एवं मछली
(B) सरीसृप एवं पक्षी
(C) उभयचर एवं कीट
(D) शैवाल एवं कवक
View Answer / उत्तर देखें
आर्कियोप्टेरिक्स में सरीसृपों और पक्षियों से संबंधित विशेषताएँ पाई गई हैं।
(A) Protein Chain Reaction
(B) Polymerase Chain Reaction
(C) Primary Cell Reaction
(D) Polymer Cell Replication
View Answer / उत्तर देखें
PCR का उपयोग DNA के किसी विशिष्ट खंड की अनेक प्रतियाँ बनाने में किया जाता है।
(A) एमाइलेज
(B) Taq DNA Polymerase
(C) पेप्सिन
(D) लाइपेज
View Answer / उत्तर देखें
यह एंजाइम Thermus aquaticus जीवाणु से प्राप्त किया गया था।
(A) एनीलिंग
(B) एक्सटेंशन
(C) डिनैचुरेशन
(D) लिगेशन
View Answer / उत्तर देखें
उच्च तापमान पर DNA की दोनों शृंखलाएँ अलग हो जाती हैं।
(A) प्रतिबंधन एंडोन्यूक्लिएज
(B) एमाइलेज
(C) पेप्सिन
(D) माल्टेज
View Answer / उत्तर देखें
ये एंजाइम विशिष्ट पहचान अनुक्रमों पर DNA को काटते हैं।
(A) परागण
(B) देह कोशिका केंद्रक स्थानांतरण
(C) PCR
(D) कृत्रिम निषेचन मात्र
View Answer / उत्तर देखें
डॉली को Somatic Cell Nuclear Transfer तकनीक से विकसित किया गया था।
(A) भोजन का पाचन
(B) व्यक्ति की आनुवंशिक पहचान
(C) रक्तचाप मापना
(D) शरीर का तापमान मापना
View Answer / उत्तर देखें
DNA फिंगरप्रिंटिंग का उपयोग फॉरेंसिक पहचान, पितृत्व परीक्षण और अज्ञात शवों की पहचान में किया जा सकता है।
(A) केवल ऊर्जा उत्पादन
(B) स्वयं का नवीकरण एवं विभेदन की क्षमता
(C) केवल रक्त जमाना
(D) केवल पाचन करना
View Answer / उत्तर देखें
स्टेम सेल स्वयं का नवीकरण कर सकती हैं और उपयुक्त परिस्थितियों में अन्य कोशिका प्रकारों में विभेदित हो सकती हैं।
(A) आनुवंशिक दोष के उपचार या नियंत्रण हेतु कोशिकाओं के आनुवंशिक पदार्थ में परिवर्तन
(B) केवल शरीर का तापमान बढ़ाना
(C) रक्त समूह बदलना
(D) भोजन का पाचन रोकना
View Answer / उत्तर देखें
जीन थेरेपी में कार्यात्मक जीन पहुँचाने या आनुवंशिक अनुक्रम में चिकित्सकीय परिवर्तन करने की रणनीतियाँ शामिल हो सकती हैं।
(A) वेक्टर
(B) हार्मोन
(C) विटामिन
(D) एंटीबॉडी
View Answer / उत्तर देखें
प्लास्मिड का उपयोग इच्छित DNA को पोषक कोशिका तक पहुँचाने के लिए किया जा सकता है।
(A) DNA काटना
(B) DNA खंडों को जोड़ना
(C) RNA को नष्ट करना
(D) प्रोटीन का पाचन
View Answer / उत्तर देखें
DNA लाइगेज DNA के टुकड़ों को जोड़ने में सहायता करता है।
(A) रक्त का थक्का बनना
(B) पाचन
(C) श्वसन
(D) दृष्टि
View Answer / उत्तर देखें
हीमोफीलिया में रक्त के थक्के बनने से संबंधित कुछ कारकों की कमी होती है।
(A) हीमोग्लोबिन जीन में बिंदु उत्परिवर्तन
(B) केवल विटामिन की कमी
(C) जीवाणु संक्रमण
(D) हार्मोन की अधिकता
View Answer / उत्तर देखें
बीटा ग्लोबिन जीन में एक विशिष्ट न्यूक्लियोटाइड परिवर्तन से हीमोग्लोबिन की संरचना प्रभावित होती है।
(A) फ्रेडरिक मीशर
(B) मेंडल
(C) डार्विन
(D) मॉर्गन
View Answer / उत्तर देखें
मीशर ने कोशिका के केंद्रक से न्यूक्लिन नामक पदार्थ पृथक किया था।
(A) STR
(B) हीमोग्लोबिन
(C) इंसुलिन
(D) ग्लूकोज
View Answer / उत्तर देखें
Short Tandem Repeats DNA के अत्यधिक परिवर्तनशील क्षेत्र हैं, जिनका उपयोग पहचान परीक्षण में किया जाता है।
(A) जो किसी विशेष पर्यावरण में प्रजनन सफलता बढ़ाते हैं
(B) जो हमेशा हानिकारक हों
(C) जो वंशानुगत न हों
(D) जो सभी जीवों में समान हों
View Answer / उत्तर देखें
प्राकृतिक चयन वंशानुगत लाभकारी विविधताओं की आवृत्ति बढ़ा सकता है।
(A) 20%
(B) 30%
(C) 40%
(D) 60%
View Answer / उत्तर देखें
Chargaff के नियम के अनुसार A=T और G=C। यदि A=20% है तो T=20% होगा। शेष 60% में G और C बराबर होंगे, अतः G=30%।
त्वरित पुनरावृत्ति – परीक्षा से पहले जरूर पढ़ें
- आनुवंशिकी का जनक – ग्रेगर जॉन मेंडल।
- मेंडल के प्रयोग – मटर के पौधे पर।
- एकसंकर संकरण F2 लक्षण प्रारूप – 3:1।
- एकसंकर संकरण F2 जीन प्रारूप – 1:2:1।
- द्विसंकर संकरण F2 लक्षण प्रारूप – 9:3:3:1।
- DNA की द्विकुंडली संरचना – वाटसन एवं क्रिक।
- DNA की शर्करा – डीऑक्सीराइबोज।
- RNA की शर्करा – राइबोज।
- DNA में थाइमिन तथा RNA में यूरैसिल।
- DNA में A–T के बीच 2 और G–C के बीच 3 हाइड्रोजन बंध।
- मानव में 46 गुणसूत्र, युग्मक में 23।
- डाउन सिंड्रोम – ट्राइसॉमी 21।
- टर्नर सिंड्रोम – 45,X।
- क्लाइनफेल्टर सिंड्रोम – 47,XXY।
- ABO रक्त समूह – कार्ल लैंडस्टीनर।
- AB रक्त समूह – सह-प्रभाविता।
- हीमोफीलिया – सामान्यतः X-सहलग्न अप्रभावी।
- DNA प्रतिकृति – अर्ध-संरक्षी।
- mRNA – संदेशवाहक RNA।
- tRNA – अमीनो अम्ल वाहक RNA।
- राइबोसोम – प्रोटीन संश्लेषण का प्रमुख स्थल।
- लैमार्क – अर्जित लक्षणों की वंशागति।
- डार्विन – प्राकृतिक चयन।
- जीवाश्म विज्ञान – Palaeontology।
- समजात अंग – अपसारी विकास।
- समरूप अंग – अभिसारी विकास।
- PCR – DNA प्रवर्धन।
- Taq Polymerase – Thermus aquaticus।
- DNA लाइगेज – DNA खंडों को जोड़ता है।
- Restriction Enzyme – DNA को विशिष्ट स्थानों पर काटता है।
- डॉली – Somatic Cell Nuclear Transfer।
- DNA फिंगरप्रिंटिंग – DNA आधारित पहचान।
- स्टेम सेल – स्वयं का नवीकरण एवं विभेदन।
- जीन थेरेपी – आनुवंशिक पदार्थ में चिकित्सकीय परिवर्तन।
संदर्भ एवं अध्ययन आधार
- NCERT कक्षा 10 विज्ञान – Heredity and Evolution.
- NCERT कक्षा 12 जीव विज्ञान – Principles of Inheritance and Variation.
- NCERT कक्षा 12 जीव विज्ञान – Molecular Basis of Inheritance.
- NCERT कक्षा 12 जीव विज्ञान – Evolution.
- NCERT कक्षा 12 जीव विज्ञान – Biotechnology: Principles and Processes.
- NCERT कक्षा 12 जीव विज्ञान – Biotechnology and its Applications.
- भारत सरकार – जैव प्रौद्योगिकी विभाग (Department of Biotechnology), भारत।
- भारत सरकार – स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय।
- विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) – आनुवंशिक एवं स्वास्थ्य संबंधी वैज्ञानिक सामग्री।
