जीव जगत का वर्गीकरण एवं जैव विविधता – सम्पूर्ण हिंदी नोट्स, जगत, संघ एवं महत्वपूर्ण MCQ

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अध्याय 5. जीव जगत का वर्गीकरण एवं जैव विविधता

Biological Classification and Biodiversity – वर्गिकी, द्विनाम पद्धति, पाँच-जगत वर्गीकरण, पादप जगत, प्राणी जगत, प्रमुख संघ एवं जैव विविधता के सम्पूर्ण हिंदी नोट्स।

प्रारंभिक जीव विज्ञान UP PET एवं UPSSSC SSC एवं Railway Police एवं UP SI Lekhpal एवं RO/ARO UPPSC एवं TGT/PGT

अध्याय की विषय-सूची

  1. वर्गिकी एवं सिस्टमैटिक्स
  2. वर्गीकरण की आवश्यकता एवं आधार
  3. द्विनाम पद्धति एवं त्रिनाम पद्धति
  4. वर्गीकरण की प्रमुख श्रेणियाँ – जगत से जाति तक
  5. मोनेरा जगत
  6. प्रोटिस्टा जगत
  7. कवक जगत – विशेषताएँ एवं प्रकार
  8. पादप जगत का वर्गीकरण
  9. थैलोफाइटा
  10. ब्रायोफाइटा
  11. टेरिडोफाइटा
  12. जिम्नोस्पर्म
  13. एंजियोस्पर्म
  14. एकबीजपत्री एवं द्विबीजपत्री पौधे
  15. प्राणी जगत का वर्गीकरण
  16. अकशेरुकी एवं कशेरुकी जीव
  17. प्रमुख संघ एवं उनकी विशेषताएँ
  18. जैव विविधता एवं उसका महत्त्व

1. वर्गिकी एवं सिस्टमैटिक्स (Taxonomy and Systematics)

पृथ्वी पर जीवों की अत्यधिक विविधता पाई जाती है। सूक्ष्म जीवाणुओं से लेकर विशालकाय व्हेल, छोटे शैवाल से लेकर विशाल वृक्षों तक जीवों की संरचना, आकार, जीवन-शैली, पोषण, प्रजनन और आवास में बहुत अंतर होता है। इन जीवों का वैज्ञानिक अध्ययन करने के लिए उनकी पहचान, नामकरण और वर्गीकरण आवश्यक है। जीवों के इसी व्यवस्थित अध्ययन को वर्गिकी और सिस्टमैटिक्स के अंतर्गत समझा जाता है।

वर्गिकी (Taxonomy)

वर्गिकी जीव विज्ञान की वह शाखा है जिसमें जीवों की पहचान (Identification), नामकरण (Nomenclature) तथा वर्गीकरण (Classification) का अध्ययन किया जाता है। इसका उद्देश्य जीवों को वैज्ञानिक आधार पर व्यवस्थित समूहों में रखना है, जिससे उनका अध्ययन और आपसी तुलना सरल हो सके।

  • पहचान: किसी जीव की विशेषताओं का अध्ययन करके उसका सही निर्धारण करना।
  • नामकरण: जीव को वैज्ञानिक नियमों के अनुसार एक मान्य नाम देना।
  • वर्गीकरण: समानताओं और भिन्नताओं के आधार पर जीवों को विभिन्न समूहों में रखना।

सिस्टमैटिक्स (Systematics)

सिस्टमैटिक्स जीवों की विविधता तथा उनके विकासीय और पारस्परिक संबंधों का व्यापक अध्ययन है। इसमें वर्गीकरण, नामकरण, पहचान और जीवों के विकासक्रम (Evolutionary Relationships) को समझना शामिल है। आधुनिक सिस्टमैटिक्स में आकृति विज्ञान के साथ-साथ कोशिकीय संरचना, आनुवंशिकी, DNA तथा जैव-रासायनिक प्रमाणों का भी उपयोग किया जाता है।

वर्गिकी एवं सिस्टमैटिक्स में अंतर

आधारवर्गिकी (Taxonomy)सिस्टमैटिक्स (Systematics)
अर्थजीवों की पहचान, नामकरण एवं वर्गीकरणजीवों की विविधता एवं उनके पारस्परिक/विकासीय संबंधों का व्यापक अध्ययन
क्षेत्रतुलनात्मक रूप से सीमितअधिक व्यापक
मुख्य आधारआकारिकी, संरचना, लक्षण एवं वर्गीकरण के नियमआकारिकी, आनुवंशिकी, DNA, विकासक्रम एवं वर्गीकरण
उद्देश्यजीवों की वैज्ञानिक पहचान और व्यवस्थाजीवों की विविधता तथा विकासीय इतिहास समझना

वर्गिकी के जनक एवं महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिक

वैज्ञानिकप्रमुख योगदान
कैरोलस लिनियस (Carolus Linnaeus)आधुनिक वर्गिकी के जनक; द्विनाम नामकरण पद्धति को व्यवस्थित रूप दिया।
अरस्तू (Aristotle)प्राचीन जीव वर्गीकरण के प्रारंभिक प्रयासों में महत्त्वपूर्ण योगदान।
थियोफ्रेस्टस (Theophrastus)वनस्पति विज्ञान के जनक; पौधों के अध्ययन और वर्गीकरण में योगदान।
आर. एच. व्हिटेकर (R. H. Whittaker)1969 में पाँच-जगत वर्गीकरण प्रस्तुत किया।
कार्ल वूज़ (Carl Woese)राइबोसोमल RNA के अध्ययन के आधार पर तीन-डोमेन प्रणाली के विकास में योगदान।
अर्न्स्ट हेकेल (Ernst Haeckel)1866 में प्रोटिस्टा जगत का प्रस्ताव रखा।
एडवर्ड चैटन (Édouard Chatton)प्रोकैरियोटिक एवं यूकैरियोटिक कोशिकाओं के अंतर को स्पष्ट करने में योगदान।
परीक्षा तथ्य: आधुनिक वर्गिकी के जनक – कैरोलस लिनियस; वनस्पति विज्ञान के जनक – थियोफ्रेस्टस; पाँच-जगत वर्गीकरण – आर. एच. व्हिटेकर (1969)।

2. वर्गीकरण की आवश्यकता एवं आधार

जीवों की संख्या और विविधता बहुत अधिक होने के कारण प्रत्येक जीव का अलग-अलग अध्ययन करना कठिन है। इसलिए समान लक्षणों वाले जीवों को समूहों में बाँटकर उनका अध्ययन किया जाता है। इस प्रक्रिया को वर्गीकरण कहते हैं। वर्गीकरण से जीवों की पहचान, अध्ययन, तुलना तथा उनके विकासीय संबंधों को समझने में सुविधा होती है।

वर्गीकरण की आवश्यकता

  • जीवों की विशाल विविधता को व्यवस्थित रूप से समझना आसान होता है।
  • समान एवं असमान लक्षणों के आधार पर जीवों की तुलना की जा सकती है।
  • नए खोजे गए जीवों की पहचान और उनका उचित स्थान निर्धारित किया जा सकता है।
  • जीवों के विकासीय संबंधों और समान पूर्वजों का अध्ययन किया जा सकता है।
  • कृषि, चिकित्सा, वानिकी, पर्यावरण संरक्षण और जैव विविधता के अध्ययन में सहायता मिलती है।

वर्गीकरण के प्रमुख आधार

जीवों का वर्गीकरण केवल उनके बाहरी आकार के आधार पर नहीं किया जाता। वैज्ञानिक वर्गीकरण में कई विशेषताओं को एक साथ ध्यान में रखा जाता है।

वर्गीकरण का आधारमुख्य प्रश्न / विशेषताउदाहरण
कोशिका का प्रकारप्रोकैरियोटिक या यूकैरियोटिक?जीवाणु – प्रोकैरियोटिक; अमीबा – यूकैरियोटिक
कोशिकाओं की संख्याएककोशिकीय या बहुकोशिकीय?अमीबा – एककोशिकीय; मानव – बहुकोशिकीय
पोषण का प्रकारस्वपोषी या परपोषी?हरे पौधे – स्वपोषी; कवक – परपोषी
कोशिका भित्तिउपस्थित है या अनुपस्थित? किस पदार्थ की बनी है?पौधे – सेल्यूलोज; कवक – काइटिन
शरीर संगठनऊतक एवं अंगों का विकास कितना है?स्पंज में वास्तविक ऊतक संगठन नहीं
प्रजननलैंगिक या अलैंगिक?कवक में बीजाणु; अनेक पौधों में लैंगिक प्रजनन
विकासीय संबंधजीवों का सामान्य पूर्वज एवं विकासक्रम क्या है?DNA एवं RNA तुलना

प्रोकैरियोटिक एवं यूकैरियोटिक जीव

आधारप्रोकैरियोटिकयूकैरियोटिक
केंद्रकसुसंगठित झिल्लीबद्ध केंद्रक अनुपस्थितझिल्लीबद्ध केंद्रक उपस्थित
झिल्लीबद्ध कोशिकांगसामान्यतः अनुपस्थितउपस्थित
DNAमुख्यतः न्यूक्लॉयड क्षेत्र मेंमुख्यतः केंद्रक में
उदाहरणजीवाणु, आर्कियाप्रोटिस्टा, कवक, पौधे, जंतु
परीक्षा तथ्य: प्रोकैरियोटिक कोशिकाओं में सुसंगठित झिल्लीबद्ध केंद्रक नहीं होता। यूकैरियोटिक कोशिकाओं में केंद्रक और झिल्लीबद्ध कोशिकांग पाए जाते हैं।

3. द्विनाम पद्धति एवं त्रिनाम पद्धति

द्विनाम नामकरण पद्धति (Binomial Nomenclature)

द्विनाम नामकरण पद्धति में प्रत्येक जीव का वैज्ञानिक नाम दो शब्दों से मिलकर बनता है। पहला शब्द वंश (Genus) का नाम और दूसरा शब्द जाति सूचक विशेषण (Specific Epithet) होता है। इस पद्धति को कैरोलस लिनियस ने व्यवस्थित रूप दिया। वैज्ञानिक नाम विश्वभर में जीव की पहचान के लिए एक समान आधार प्रदान करते हैं।

वैज्ञानिक नाम = वंश का नाम + जाति सूचक विशेषण

उदाहरण के लिए मानव का वैज्ञानिक नाम Homo sapiens है। इसमें Homo वंश का नाम है और sapiens जाति सूचक विशेषण है।

द्विनाम नामकरण के नियम

  1. वैज्ञानिक नाम सामान्यतः दो शब्दों का होता है।
  2. पहला शब्द वंश (Genus) का नाम होता है और उसका पहला अक्षर बड़ा लिखा जाता है।
  3. दूसरा शब्द जाति सूचक विशेषण होता है और इसे छोटे अक्षरों में लिखा जाता है।
  4. मुद्रित रूप में वैज्ञानिक नाम इटैलिक (Italic) में लिखे जाते हैं।
  5. हस्तलिखित रूप में दोनों शब्दों को अलग-अलग रेखांकित किया जाता है।
  6. वैज्ञानिक नाम लैटिन या लैटिनीकृत रूप में होते हैं।
  7. वैज्ञानिक नाम के बाद नामकरण करने वाले वैज्ञानिक का नाम या संक्षिप्त रूप दिया जा सकता है; यह सामान्यतः इटैलिक में नहीं लिखा जाता।

प्रमुख जीवों के वैज्ञानिक नाम

जीववैज्ञानिक नाम
मनुष्यHomo sapiens
आमMangifera indica
आलूSolanum tuberosum
धानOryza sativa
गेहूँTriticum aestivum
मटरPisum sativum
सरसोंBrassica juncea
नीमAzadirachta indica
शेरPanthera leo
बाघPanthera tigris
गायBos indicus (भारतीय गाय)
कुत्ताCanis lupus familiaris
बिल्लीFelis catus
कबूतरColumba livia
मेंढकHoplobatrachus tigerinus (भारतीय बुलफ्रॉग)

त्रिनाम नामकरण पद्धति (Trinomial Nomenclature)

जब किसी जीव का वैज्ञानिक नाम तीन शब्दों में लिखा जाता है, तो उसे त्रिनाम नामकरण पद्धति कहते हैं। इसका उपयोग सामान्यतः उपजाति (Subspecies) या उससे संबंधित विशिष्ट वर्गीकरण इकाई की पहचान के लिए किया जाता है। इसमें वंश, जाति सूचक विशेषण और उपजाति सूचक नाम शामिल होते हैं।

वंश + जाति सूचक विशेषण + उपजाति सूचक नाम

उदाहरण: Panthera tigris tigris – बाघ की एक उपजाति के लिए प्रयुक्त नाम।

परीक्षा में भ्रम न करें: द्विनाम पद्धति में दो शब्द होते हैं, जबकि त्रिनाम पद्धति में तीन शब्द। द्विनाम नाम में पहला शब्द वंश और दूसरा जाति सूचक विशेषण होता है।

4. वर्गीकरण की प्रमुख श्रेणियाँ – जगत से जाति तक

जीवों के वैज्ञानिक वर्गीकरण में विभिन्न स्तरों या श्रेणियों का उपयोग किया जाता है। प्रत्येक श्रेणी को वर्गिकी श्रेणी (Taxonomic Category) कहते हैं और इन श्रेणियों के क्रमबद्ध समूह को वर्गिकी पदानुक्रम (Taxonomic Hierarchy) कहा जाता है।

वर्गिकी पदानुक्रम का क्रम

जगत → संघ/विभाग → वर्ग → गण → कुल → वंश → जाति

आधुनिक वर्गीकरण में जगत से ऊपर डोमेन (Domain) की श्रेणी भी प्रयुक्त होती है। पौधों में संघ के स्थान पर सामान्यतः विभाग (Division) शब्द का प्रयोग किया जाता है।

श्रेणीअंग्रेजी नामअर्थ / विशेषता
डोमेनDomainजीवों का व्यापकतम आधुनिक वर्गीकरण स्तर।
जगतKingdomसमान प्रमुख लक्षणों वाले बड़े समूह।
संघ/विभागPhylum/Divisionसमान मूल शरीर संगठन वाले वर्गों का समूह।
वर्गClassसमान लक्षण वाले गणों का समूह।
गणOrderसमान कुलों का समूह।
कुलFamilyसमान वंशों का समूह।
वंशGenusनिकट संबंधी जातियों का समूह।
जातिSpeciesवर्गीकरण की मूल इकाई।

मनुष्य का वर्गीकरण

श्रेणीमनुष्य का वर्गीकरण
डोमेनEukarya
जगतAnimalia
संघChordata
उपसंघVertebrata
वर्गMammalia
गणPrimates
कुलHominidae
वंशHomo
जातिHomo sapiens
परीक्षा तथ्य: जाति (Species) वर्गीकरण की मूल इकाई है। जैसे-जैसे जगत से जाति की ओर बढ़ते हैं, जीवों की समानता बढ़ती है और समूह में जीवों की संख्या सामान्यतः कम होती जाती है।

5. मोनेरा जगत (Kingdom Monera)

आर. एच. व्हिटेकर के पाँच-जगत वर्गीकरण में मोनेरा जगत में प्रोकैरियोटिक जीवों को रखा गया था। इन जीवों में सुसंगठित झिल्लीबद्ध केंद्रक और झिल्लीबद्ध कोशिकांग नहीं पाए जाते। अधिकांश जीव एककोशिकीय होते हैं। जीवाणु, सायनोबैक्टीरिया तथा माइकोप्लाज्मा इसके प्रमुख उदाहरण हैं।

मोनेरा की प्रमुख विशेषताएँ

  • कोशिकाएँ प्रोकैरियोटिक होती हैं।
  • सुसंगठित केंद्रक अनुपस्थित होता है।
  • झिल्लीबद्ध कोशिकांग जैसे माइटोकॉन्ड्रिया और गॉल्जी तंत्र नहीं पाए जाते।
  • अधिकांश जीव एककोशिकीय होते हैं।
  • पोषण स्वपोषी या परपोषी दोनों प्रकार का हो सकता है।
  • प्रजनन सामान्यतः अलैंगिक, प्रायः द्विखंडन द्वारा होता है।
  • कुछ जीव प्रतिकूल परिस्थितियों में विशेष संरचनाएँ बना सकते हैं।

जीवाणु (Bacteria)

जीवाणु सूक्ष्म, एककोशिकीय प्रोकैरियोटिक जीव हैं। ये मिट्टी, जल, वायु, भोजन, गर्म जलस्रोतों और अन्य जीवों के शरीर में पाए जाते हैं। कुछ जीवाणु लाभकारी होते हैं, जबकि कुछ रोग उत्पन्न करते हैं।

आकार के आधार पर जीवाणुओं के प्रकार

प्रकारआकारउदाहरण / पहचान
कॉकस (Coccus)गोलाकारगोल या अंडाकार जीवाणु
बैसिलस (Bacillus)छड़ाकारदंड के समान
स्पिरिलम (Spirillum)सर्पिलाकारकुंडलित या सर्पिल आकृति
विब्रियो (Vibrio)अल्पविरामाकारकॉमा जैसी आकृति

जीवाणुओं का महत्त्व

  • दही बनाने में लैक्टिक अम्ल जीवाणु उपयोगी हैं।
  • दलहनी पौधों की जड़ों में Rhizobium वायुमंडलीय नाइट्रोजन के स्थिरीकरण में सहायता करता है।
  • कुछ जीवाणु अपघटन द्वारा पोषक तत्वों का पुनर्चक्रण करते हैं।
  • कुछ जीवाणु रोग उत्पन्न करते हैं, जैसे क्षयरोग का कारक Mycobacterium tuberculosis।
  • कुछ जीवाणु औद्योगिक जैव-प्रौद्योगिकी में उपयोगी हैं।

सायनोबैक्टीरिया (Cyanobacteria)

सायनोबैक्टीरिया प्रकाश संश्लेषण करने वाले प्रोकैरियोटिक जीव हैं। इन्हें नील-हरित शैवाल भी कहा जाता रहा है, लेकिन ये वास्तविक शैवाल नहीं, बल्कि जीवाणु हैं। इनमें क्लोरोफिल-a तथा अन्य वर्णक पाए जाते हैं। कुछ सायनोबैक्टीरिया वायुमंडलीय नाइट्रोजन का स्थिरीकरण भी करते हैं।

उदाहरण – Nostoc, Anabaena और Oscillatoria।

माइकोप्लाज्मा (Mycoplasma)

माइकोप्लाज्मा अत्यंत छोटे जीवित कोशिकीय जीवों में शामिल हैं। इनमें कोशिका भित्ति अनुपस्थित होती है। इसलिए इनका आकार निश्चित नहीं होता और ये बहुरूपी (Pleomorphic) हो सकते हैं। कुछ माइकोप्लाज्मा पौधों और जंतुओं में रोग उत्पन्न करते हैं।

परीक्षा तथ्य: मोनेरा – प्रोकैरियोटिक; सायनोबैक्टीरिया – प्रकाश संश्लेषी प्रोकैरियोट; माइकोप्लाज्मा – कोशिका भित्ति रहित।

6. प्रोटिस्टा जगत (Kingdom Protista)

व्हिटेकर के पाँच-जगत वर्गीकरण में प्रोटिस्टा जगत में मुख्यतः एककोशिकीय यूकैरियोटिक जीवों को रखा गया। इनमें स्पष्ट केंद्रक तथा झिल्लीबद्ध कोशिकांग पाए जाते हैं। अधिकांश जीव जल या नम स्थानों में रहते हैं। कुछ स्वपोषी होते हैं, जबकि कुछ परपोषी या मिश्रपोषी होते हैं।

प्रोटिस्टा की प्रमुख विशेषताएँ

  • कोशिकाएँ यूकैरियोटिक होती हैं।
  • अधिकांश जीव एककोशिकीय होते हैं।
  • इनमें स्पष्ट केंद्रक और झिल्लीबद्ध कोशिकांग होते हैं।
  • अनेक जीव जल में पाए जाते हैं।
  • गति के लिए कशाभिका, पक्ष्माभ या कूटपाद का उपयोग कर सकते हैं।
  • पोषण स्वपोषी, परपोषी या मिश्रपोषी हो सकता है।

प्रोटिस्टा के प्रमुख समूह एवं उदाहरण

1. क्राइसोफाइट्स (Chrysophytes)

इस समूह में डायटम और स्वर्ण शैवाल जैसे जीव शामिल किए जाते हैं। डायटम की कोशिका भित्ति सिलिका से बनी दो आधी संरचनाओं से युक्त होती है, जो एक-दूसरे पर ढक्कन और डिब्बे की तरह फिट होती हैं। इनके अवशेषों से डायटोमेसियस अर्थ बनती है।

2. डाइनोफ्लैजिलेट्स (Dinoflagellates)

ये मुख्यतः समुद्री जीव होते हैं। इनमें सामान्यतः दो कशाभिकाएँ होती हैं। कुछ प्रजातियाँ लाल ज्वार (Red Tide) उत्पन्न कर सकती हैं। उदाहरण – Gonyaulax।

3. यूग्लीनॉइड्स (Euglenoids)

ये सामान्यतः मीठे जल में पाए जाते हैं। इनमें कोशिका भित्ति के स्थान पर प्रोटीनयुक्त पेलिकल होता है। प्रकाश की उपस्थिति में प्रकाश संश्लेषण कर सकते हैं और प्रकाश के अभाव में परपोषी व्यवहार दिखा सकते हैं। उदाहरण – Euglena।

4. स्लाइम मोल्ड्स (Slime Moulds)

ये मृत एवं सड़ते कार्बनिक पदार्थों पर पाए जाने वाले सैप्रोफाइटिक प्रोटिस्ट हैं। अनुकूल परिस्थितियों में ये प्लाज्मोडियम जैसी संरचना बनाते हैं और प्रतिकूल दशाओं में बीजाणु बनाते हैं।

5. प्रोटोजोआ (Protozoans)

प्रोटोजोआ परपोषी, प्रायः एककोशिकीय यूकैरियोटिक जीव हैं। इनमें कूटपाद, कशाभिका या पक्ष्माभ द्वारा गति करने वाले समूह शामिल हैं।

प्रोटोजोआ समूहगति का साधन / विशेषताउदाहरण
अमीबीय प्रोटोजोआकूटपाद (Pseudopodia)Amoeba, Entamoeba
कशाभिकीय प्रोटोजोआकशाभिका (Flagella)Trypanosoma
पक्ष्माभिकीय प्रोटोजोआपक्ष्माभ (Cilia)Paramecium
स्पोरोजोआसंक्रमणकारी बीजाणु-सदृश अवस्थाएँPlasmodium
परीक्षा तथ्य: अमीबा – कूटपाद; पैरामीशियम – पक्ष्माभ; यूग्लीना – पेलिकल; डायटम – सिलिका की कोशिका भित्ति; प्लाज्मोडियम – मलेरिया का कारक।

7. कवक जगत – विशेषताएँ एवं प्रकार (Kingdom Fungi)

कवक यूकैरियोटिक, परपोषी जीव हैं। ये अपना भोजन स्वयं प्रकाश संश्लेषण द्वारा नहीं बनाते, क्योंकि इनमें क्लोरोफिल अनुपस्थित होता है। अधिकांश कवक मृत एवं सड़ते कार्बनिक पदार्थों से पोषण प्राप्त करते हैं, जबकि कुछ परजीवी या सहजीवी होते हैं। कवक की कोशिका भित्ति मुख्यतः काइटिन और अन्य पदार्थों से बनी होती है।

कवक की प्रमुख विशेषताएँ

  • कवक यूकैरियोटिक जीव हैं।
  • इनमें क्लोरोफिल सामान्यतः अनुपस्थित होता है।
  • ये परपोषी पोषण करते हैं।
  • कोशिका भित्ति मुख्यतः काइटिनयुक्त होती है।
  • शरीर सामान्यतः तंतु जैसी संरचनाओं से बना होता है, जिन्हें हाइफा (Hyphae) कहते हैं।
  • हाइफा का जाल माइसीलियम (Mycelium) कहलाता है।
  • प्रजनन अलैंगिक और लैंगिक दोनों प्रकार से हो सकता है।
  • कुछ कवक एककोशिकीय होते हैं, जैसे यीस्ट।

कवक में पोषण के प्रकार

पोषण का प्रकारविशेषताउदाहरण
मृतोपजीवी (Saprophytic)मृत एवं सड़ते कार्बनिक पदार्थों से भोजनराइजोपस, अनेक मशरूम
परजीवी (Parasitic)जीवित पोषक से भोजन प्राप्त करनापौधों पर रोगकारी रस्ट कवक
सहजीवी (Symbiotic)दूसरे जीव के साथ पारस्परिक लाभ का संबंधलाइकेन, माइकोराइजा

कवक के प्रमुख वर्ग

पारंपरिक पाठ्यपुस्तकीय वर्गीकरण में कवकों को कुछ प्रमुख वर्गों में बाँटा जाता है। आधुनिक वर्गिकी में कवक का वर्गीकरण विकासीय और आणविक प्रमाणों के आधार पर अधिक विस्तृत है। प्रतियोगी परीक्षाओं में पारंपरिक समूहों के नाम और उदाहरण भी महत्त्वपूर्ण हैं।

1. फाइकोमाइसीट्स (Phycomycetes)

इनमें कवक तंतु सामान्यतः अविभाजित और बहुनाभिकीय हो सकते हैं। ये नम स्थानों, सड़े पदार्थों और कुछ जलीय आवासों में पाए जाते हैं। उदाहरण – Rhizopus, Mucor, Albugo।

2. ऐस्कोमाइसीट्स (Ascomycetes)

इन्हें थैली कवक (Sac Fungi) कहा जाता है। लैंगिक बीजाणु ऐस्कस (Ascus) नामक थैलीनुमा संरचना में बनते हैं। उदाहरण – यीस्ट, Penicillium, Aspergillus, Neurospora और मोरेल।

3. बेसिडियोमाइसीट्स (Basidiomycetes)

इनमें लैंगिक बीजाणु बेसिडियम नामक संरचना पर बाहरी रूप से बनते हैं। मशरूम, पफबॉल और रस्ट/स्मट कवक के अनेक सदस्य इस समूह में आते हैं। उदाहरण – Agaricus, Puccinia, Ustilago।

4. ड्यूटेरोमाइसीट्स (Deuteromycetes)

पारंपरिक वर्गीकरण में ऐसे कवक जिनकी लैंगिक अवस्था ज्ञात नहीं थी, उन्हें अपूर्ण कवक (Imperfect Fungi) कहा गया। इनमें अलैंगिक बीजाणुओं द्वारा प्रजनन देखा जाता है। उदाहरण – Alternaria, Colletotrichum, Trichoderma। इनमें से कई को बाद में अन्य कवक समूहों में रखा गया।

महत्त्वपूर्ण कवक एवं उनके उपयोग

कवकमहत्त्व / उपयोग
Saccharomyces cerevisiaeयीस्ट; ब्रेड एवं किण्वन उद्योग में उपयोग।
Penicilliumपेनिसिलिन एंटीबायोटिक की खोज से संबंधित कवक वंश।
Rhizopusब्रेड मोल्ड; मृतोपजीवी कवक।
Agaricusखाने योग्य मशरूम का प्रमुख वंश।
Pucciniaगेहूँ में रस्ट रोग का कारक।
Ustilagoस्मट रोग से संबंधित कवक।

लाइकेन (Lichen)

लाइकेन शैवाल या सायनोबैक्टीरिया तथा कवक के बीच सहजीवी संघटन है। सामान्यतः प्रकाश संश्लेषी साथी भोजन बनाता है और कवक जल, खनिज तथा सुरक्षा उपलब्ध कराने में सहायता करता है। लाइकेन वायु प्रदूषण, विशेषकर सल्फर डाइऑक्साइड के प्रति संवेदनशील होते हैं; इसलिए इन्हें वायु गुणवत्ता के जैव संकेतक के रूप में उपयोग किया जाता है।

माइकोराइजा (Mycorrhiza)

माइकोराइजा पौधों की जड़ों और कवक के बीच सहजीवी संबंध है। कवक पौधे को जल एवं खनिजों, विशेषकर फॉस्फोरस, के अवशोषण में सहायता करता है और पौधा कवक को कार्बनिक भोजन प्रदान करता है।

परीक्षा तथ्य: कवक की कोशिका भित्ति – काइटिन; यीस्ट – एककोशिकीय कवक; लाइकेन – शैवाल/सायनोबैक्टीरिया एवं कवक का सहजीवन; माइकोराइजा – जड़ और कवक का सहजीवन।

8. पादप जगत का वर्गीकरण (Classification of Plant Kingdom)

पादप जगत में प्रकाश संश्लेषण करने वाले अनेक यूकैरियोटिक जीव शामिल हैं। पारंपरिक वर्गीकरण में पौधों को मुख्यतः थैलोफाइटा, ब्रायोफाइटा, टेरिडोफाइटा, जिम्नोस्पर्म और एंजियोस्पर्म समूहों में पढ़ाया जाता है। यह वर्गीकरण शरीर संगठन, संवहनी ऊतक, बीज निर्माण और प्रजनन संरचनाओं के आधार पर समझा जाता है।

पादप जगत के वर्गीकरण के प्रमुख आधार

  • पौधे का शरीर जड़, तना और पत्ती में विभेदित है या नहीं।
  • संवहनी ऊतक – जाइलम एवं फ्लोएम – उपस्थित हैं या अनुपस्थित।
  • बीज बनते हैं या नहीं।
  • बीज नग्न हैं या फल के भीतर बंद हैं।
  • प्रजनन बीजाणुओं या बीजों द्वारा होता है।
  • निषेचन और भ्रूण विकास की प्रक्रिया कैसी है।
समूहशरीर संगठनसंवहनी ऊतकबीजउदाहरण
थैलोफाइटाथैलस, वास्तविक जड़-तना-पत्ती नहींअनुपस्थितनहींस्पाइरोगाइरा, क्लैमाइडोमोनास
ब्रायोफाइटासरल शरीर, वास्तविक जड़ नहीं; राइजॉइडअनुपस्थितनहींरिक्सिया, फ्यूनेरिया
टेरिडोफाइटावास्तविक जड़, तना, पत्तीउपस्थितनहींफर्न, सेलाजिनेला
जिम्नोस्पर्मविकसित पादप शरीरउपस्थितनग्न बीजसाइकस, पाइनस
एंजियोस्पर्मविकसित पादप शरीर एवं पुष्पउपस्थितफल के भीतर बंदआम, गेहूँ, मटर
महत्त्वपूर्ण: थैलोफाइटा, ब्रायोफाइटा और टेरिडोफाइटा को पारंपरिक पाठ्यक्रम में क्रिप्टोगैम (बीजरहित पौधे) के अंतर्गत पढ़ाया जाता है। जिम्नोस्पर्म और एंजियोस्पर्म बीजीय पौधे हैं। आधुनिक वनस्पति वर्गिकी में कुछ पारंपरिक समूहों की सीमाएँ और नामकरण अलग हो सकते हैं।

9. थैलोफाइटा (Thallophyta)

थैलोफाइटा पारंपरिक वनस्पति वर्गीकरण का समूह है, जिसमें ऐसे सरल पौधों को रखा जाता है जिनका शरीर थैलस (Thallus) कहलाता है। इनमें वास्तविक जड़, तना और पत्ती का विभेदन नहीं होता। संवहनी ऊतक भी अनुपस्थित होते हैं। इस समूह में मुख्यतः शैवाल (Algae) का अध्ययन किया जाता है।

थैलोफाइटा की विशेषताएँ

  • शरीर थैलस के रूप में होता है।
  • वास्तविक जड़, तना एवं पत्ती नहीं होते।
  • जाइलम और फ्लोएम अनुपस्थित होते हैं।
  • अधिकांश शैवाल जलीय होते हैं।
  • प्रजनन कायिक, अलैंगिक और लैंगिक तरीकों से हो सकता है।
  • इनमें क्लोरोफिल तथा अन्य प्रकाश संश्लेषी वर्णक पाए जाते हैं।

शैवाल के प्रमुख समूह

1. हरित शैवाल (Chlorophyceae)

इनमें क्लोरोफिल-a और क्लोरोफिल-b प्रमुख वर्णक होते हैं। भोजन सामान्यतः स्टार्च के रूप में संचित होता है। उदाहरण – Chlamydomonas, Spirogyra, Ulothrix, Volvox।

2. भूरे शैवाल (Phaeophyceae)

इनमें फ्यूकोजैंथिन वर्णक के कारण भूरा रंग दिखाई देता है। ये मुख्यतः समुद्री होते हैं। भोजन लैमिनेरिन और मैनिटॉल के रूप में संचित हो सकता है। उदाहरण – Ectocarpus, Sargassum, Laminaria, Fucus।

3. लाल शैवाल (Rhodophyceae)

इनमें फाइकोएरिथ्रिन वर्णक के कारण लाल रंग दिखाई देता है। ये मुख्यतः समुद्री होते हैं। भोजन फ्लोरिडियन स्टार्च के रूप में संचित होता है। उदाहरण – Polysiphonia, Porphyra, Gelidium, Gracilaria।

समूहप्रमुख वर्णकभोजन संचयउदाहरण
हरित शैवालक्लोरोफिल-a एवं bस्टार्चस्पाइरोगाइरा, वॉल्वॉक्स
भूरे शैवालफ्यूकोजैंथिनलैमिनेरिन एवं मैनिटॉलसारगैसम, लैमिनेरिया
लाल शैवालफाइकोएरिथ्रिनफ्लोरिडियन स्टार्चपॉलीसाइफोनिया, पोर्फाइरा

शैवाल का आर्थिक महत्त्व

  • शैवाल जलीय पारितंत्र में प्राथमिक उत्पादक हैं और ऑक्सीजन निर्माण में योगदान करते हैं।
  • कुछ शैवाल खाद्य पदार्थ के रूप में उपयोग किए जाते हैं।
  • आगर (Agar) का उत्पादन कुछ लाल शैवाल, जैसे Gelidium और Gracilaria, से किया जाता है।
  • एल्जिनेट (Alginate) कुछ भूरे शैवाल से प्राप्त होता है।
  • कैराजीनन (Carrageenan) कुछ लाल शैवाल से प्राप्त किया जाता है।
परीक्षा तथ्य: स्पाइरोगाइरा – हरित शैवाल; सारगैसम – भूरा शैवाल; पॉलीसाइफोनिया – लाल शैवाल; आगर – कुछ लाल शैवाल से।

10. ब्रायोफाइटा (Bryophyta)

ब्रायोफाइटा को पादप जगत के उभयचर (Amphibians of Plant Kingdom) कहा जाता है, क्योंकि ये स्थल पर रहते हैं लेकिन लैंगिक प्रजनन के लिए जल पर निर्भर होते हैं। ये सामान्यतः नम एवं छायादार स्थानों पर पाए जाते हैं। इनमें वास्तविक जड़, तना और पत्ती नहीं होते तथा जाइलम-फ्लोएम जैसे विकसित संवहनी ऊतक अनुपस्थित रहते हैं।

ब्रायोफाइटा की प्रमुख विशेषताएँ

  • ये छोटे एवं सरल स्थलवासी पौधे होते हैं।
  • वास्तविक जड़ के स्थान पर राइजॉइड पाए जाते हैं।
  • संवहनी ऊतक अनुपस्थित होते हैं।
  • निषेचन के लिए जल आवश्यक होता है, क्योंकि नर युग्मक गतिशील होते हैं।
  • इनमें युग्मकोद्भिद (Gametophyte) प्रमुख एवं स्वतंत्र अवस्था होती है।
  • बीज नहीं बनते; बीजाणुओं द्वारा प्रसार होता है।

ब्रायोफाइटा के प्रमुख समूह

1. लिवरवर्ट्स (Liverworts)

इनका शरीर प्रायः चपटा, थैलस जैसा होता है। ये नम और छायादार स्थानों पर पाए जाते हैं। उदाहरण – Riccia और Marchantia।

2. मॉसेस (Mosses)

इनमें पत्ती जैसे एवं तने जैसे भाग स्पष्ट दिखाई देते हैं, लेकिन ये वास्तविक जड़ और संवहनी ऊतक नहीं रखते। इनमें स्पोरोफाइट की संरचना अपेक्षाकृत अधिक विकसित होती है। उदाहरण – Funaria, Sphagnum, Polytrichum।

ब्रायोफाइटा का महत्त्व

  • मिट्टी निर्माण और चट्टानों के अपक्षय में योगदान करते हैं।
  • जल धारण करने में सहायक होते हैं।
  • Sphagnum से पीट (Peat) बनती है, जिसका उपयोग ईंधन एवं बागवानी में किया गया है।
  • मृदा अपरदन कम करने में सहायता कर सकते हैं।
परीक्षा तथ्य: ब्रायोफाइटा – पादप जगत के उभयचर; इनमें संवहनी ऊतक नहीं होते; निषेचन के लिए जल आवश्यक है; रिक्सिया और मार्चेन्टिया लिवरवर्ट के उदाहरण हैं।

11. टेरिडोफाइटा (Pteridophyta)

टेरिडोफाइटा को संवहनी क्रिप्टोगैम (Vascular Cryptogams) कहा जाता है। इनमें जाइलम और फ्लोएम जैसे संवहनी ऊतक पाए जाते हैं, लेकिन ये बीज नहीं बनाते। इनका शरीर वास्तविक जड़, तना और पत्ती में विभेदित होता है। प्रजनन मुख्यतः बीजाणुओं द्वारा होता है।

टेरिडोफाइटा की प्रमुख विशेषताएँ

  • वास्तविक जड़, तना एवं पत्ती पाए जाते हैं।
  • जाइलम और फ्लोएम उपस्थित होते हैं।
  • बीज एवं पुष्प नहीं बनते।
  • बीजाणुओं द्वारा प्रजनन होता है।
  • स्पोरोफाइट प्रमुख, स्वतंत्र एवं विकसित अवस्था होती है।
  • निषेचन के लिए सामान्यतः जल आवश्यक होता है।

टेरिडोफाइटा के प्रमुख उदाहरण

उदाहरणविशेषता
Selaginellaविषमबीजाणुक टेरिडोफाइट का उदाहरण।
Equisetumहॉर्सटेल के नाम से जाना जाता है।
Pterisफर्न का उदाहरण।
Dryopterisफर्न का एक वंश।
Lycopodiumक्लब मॉस का उदाहरण।
Adiantumमेडेनहेयर फर्न के नाम से प्रसिद्ध।

समबीजाणुक एवं विषमबीजाणुक

समबीजाणुक (Homosporous): ऐसे पौधे जिनमें एक ही प्रकार के बीजाणु बनते हैं।

विषमबीजाणुक (Heterosporous): ऐसे पौधे जिनमें दो प्रकार के बीजाणु बनते हैं – छोटे लघुबीजाणु (Microspores) और बड़े गुरुबीजाणु (Megaspores)। Selaginella और Salvinia इसके उदाहरण हैं। विषमबीजाणुता को बीज की उत्पत्ति की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण विकासीय कदम माना जाता है।

परीक्षा तथ्य: टेरिडोफाइटा – प्रथम विकसित संवहनी बीजरहित पौधों का समूह; जाइलम एवं फ्लोएम उपस्थित; सेलाजिनेला – विषमबीजाणुक।

12. जिम्नोस्पर्म (Gymnosperms)

जिम्नोस्पर्म ऐसे बीजीय पौधे हैं जिनके बीज अंडाशय या फल के भीतर बंद नहीं होते, बल्कि नग्न अवस्था में पाए जाते हैं। 'Gymnosperm' शब्द का अर्थ नग्न बीज (Naked Seeds) है। इनमें पुष्पों के स्थान पर सामान्यतः शंकु (Cones) बनते हैं। इनका शरीर जड़, तना और पत्ती में विभेदित होता है तथा संवहनी ऊतक उपस्थित होते हैं।

जिम्नोस्पर्म की प्रमुख विशेषताएँ

  • ये बीजीय पौधे हैं।
  • बीज नग्न होते हैं, फल के भीतर बंद नहीं होते।
  • वास्तविक जड़, तना और पत्तियाँ पाई जाती हैं।
  • जाइलम और फ्लोएम उपस्थित होते हैं।
  • प्रजनन संरचनाएँ सामान्यतः नर एवं मादा शंकुओं के रूप में होती हैं।
  • अधिकांश जिम्नोस्पर्म काष्ठीय एवं सदाबहार होते हैं।
  • परागण प्रायः वायु द्वारा होता है।

जिम्नोस्पर्म के प्रमुख उदाहरण

पौधाविशेषता
Cycasताड़ जैसा दिखने वाला जिम्नोस्पर्म; सामान्यतः द्विगृही।
Pinusचीड़; शंकुधारी वृक्ष, सुई जैसी पत्तियाँ।
Ginkgo bilobaजीवित जीवाश्म के रूप में प्रसिद्ध जिम्नोस्पर्म।
Gnetumकुछ लक्षणों में आवृतबीजी पौधों से समानता।
Ephedraऔषधीय महत्त्व वाला जिम्नोस्पर्म वंश।

जिम्नोस्पर्म का महत्त्व

  • चीड़, देवदार और अन्य शंकुधारी वृक्ष लकड़ी प्रदान करते हैं।
  • कुछ पौधों से रेजिन और तारपीन प्राप्त होते हैं।
  • कुछ जिम्नोस्पर्म का औषधीय महत्त्व है।
  • वन पारितंत्र में ये कार्बन संचय और आवास प्रदान करने में योगदान करते हैं।
परीक्षा तथ्य: जिम्नोस्पर्म – नग्न बीज; पाइनस – शंकुधारी; साइकस – जिम्नोस्पर्म; इनमें फल का निर्माण नहीं होता।

13. एंजियोस्पर्म (Angiosperms)

एंजियोस्पर्म या आवृतबीजी पौधे वे पौधे हैं जिनके बीज अंडाशय के भीतर विकसित होते हैं और निषेचन के बाद अंडाशय फल में परिवर्तित हो जाता है। इनमें पुष्प पाए जाते हैं। ये पृथ्वी पर पौधों का सबसे बड़ा एवं अत्यधिक विविध समूह हैं।

एंजियोस्पर्म की प्रमुख विशेषताएँ

  • इनमें पुष्प पाए जाते हैं।
  • बीज फल के भीतर बंद रहते हैं।
  • जड़, तना और पत्तियाँ स्पष्ट रूप से विकसित होते हैं।
  • जाइलम और फ्लोएम विकसित होते हैं।
  • इनमें परागण और निषेचन की प्रक्रिया होती है।
  • इनमें द्विनिषेचन (Double Fertilization) पाया जाता है, जो आवृतबीजियों की विशिष्ट विशेषता है।
  • इनमें भ्रूण और बीज का निर्माण होता है।

द्विनिषेचन (Double Fertilization)

आवृतबीजी पौधों में परागनलिका द्वारा दो नर युग्मक भ्रूणकोष तक पहुँचते हैं। एक नर युग्मक अंड कोशिका से संलयित होकर द्विगुणित युग्मनज बनाता है। दूसरे नर युग्मक का संलयन दो ध्रुवीय केंद्रकों या द्वितीयक केंद्रक से होता है, जिससे सामान्यतः त्रिगुणित प्राथमिक भ्रूणपोष केंद्रक बनता है। इन दो संलयनों को संयुक्त रूप से द्विनिषेचन कहा जाता है।

एक नर युग्मक + अंड कोशिका → युग्मनज (2n)
दूसरा नर युग्मक + दो ध्रुवीय केंद्रक → प्राथमिक भ्रूणपोष केंद्रक (3n)

एंजियोस्पर्म के उदाहरण

  • गेहूँ, धान, मक्का और गन्ना।
  • आम, अमरूद, सेब और केला।
  • मटर, चना, अरहर और सरसों।
  • गुलाब, सूरजमुखी और गुड़हल।
परीक्षा तथ्य: एंजियोस्पर्म – आवृतबीजी; बीज फल के भीतर बंद; पुष्प उपस्थित; द्विनिषेचन इनकी प्रमुख विशिष्ट विशेषता है।

14. एकबीजपत्री एवं द्विबीजपत्री पौधे

आवृतबीजी पौधों को बीज में उपस्थित बीजपत्रों की संख्या के आधार पर पारंपरिक रूप से एकबीजपत्री (Monocotyledons) और द्विबीजपत्री (Dicotyledons) में बाँटा जाता है। आधुनिक वर्गिकी में अधिकांश पारंपरिक द्विबीजपत्री पौधों को यूडिकॉट्स (Eudicots) तथा कुछ अन्य समूहों में व्यवस्थित किया जाता है, लेकिन प्रतियोगी परीक्षाओं में एकबीजपत्री और द्विबीजपत्री का पारंपरिक अंतर अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

एकबीजपत्री पौधे (Monocotyledons)

  • बीज में सामान्यतः एक बीजपत्र होता है।
  • पत्तियों में सामान्यतः समानांतर शिरा-विन्यास पाया जाता है।
  • रेशेदार जड़ तंत्र सामान्य है।
  • तने के संवहनी बंडल सामान्यतः बिखरे होते हैं।
  • द्वितीयक वृद्धि सामान्यतः अनुपस्थित होती है।
  • पुष्प के भाग प्रायः तीन या तीन के गुणज में होते हैं।

द्विबीजपत्री पौधे (Dicotyledons)

  • बीज में सामान्यतः दो बीजपत्र होते हैं।
  • पत्तियों में सामान्यतः जालिकावत शिरा-विन्यास पाया जाता है।
  • मूसला जड़ तंत्र सामान्य है।
  • तने के संवहनी बंडल सामान्यतः वलय में व्यवस्थित होते हैं।
  • कई द्विबीजपत्री पौधों में द्वितीयक वृद्धि होती है।
  • पुष्प के भाग प्रायः चार या पाँच अथवा इनके गुणज में होते हैं।
आधारएकबीजपत्रीद्विबीजपत्री
बीजपत्रएकदो
पत्ती शिरा-विन्याससमानांतरजालिकावत
जड़ तंत्रसामान्यतः रेशेदारसामान्यतः मूसला
संवहनी बंडलतने में बिखरेतने में वलयाकार
द्वितीयक वृद्धिसामान्यतः अनुपस्थितअनेक में उपस्थित
पुष्प भागतीन या उसके गुणजचार/पाँच या उनके गुणज
उदाहरणगेहूँ, धान, मक्का, प्याजमटर, चना, सरसों, आम
ध्यान दें: ये सामान्य लक्षण हैं, हर पौधे पर बिना अपवाद लागू नहीं होते। केले में समानांतर शिरा-विन्यास और मक्का में रेशेदार जड़ एकबीजपत्री लक्षण हैं; मटर और आम द्विबीजपत्री के उदाहरण हैं।

15. प्राणी जगत का वर्गीकरण (Classification of Animal Kingdom)

प्राणी जगत में बहुकोशिकीय, यूकैरियोटिक और परपोषी जीव शामिल हैं। इनकी कोशिकाओं में सामान्यतः कोशिका भित्ति नहीं होती। प्राणी जगत के वर्गीकरण में शरीर संगठन, सममिति, जनन स्तर, देहगुहा, खंडीभवन, पृष्ठरज्जु और अन्य संरचनात्मक लक्षणों का अध्ययन किया जाता है।

प्राणी वर्गीकरण के प्रमुख आधार

1. संगठन का स्तर (Level of Organisation)

  • कोशिकीय स्तर: कोशिकाएँ कार्य करती हैं, लेकिन वास्तविक ऊतक नहीं बनते। उदाहरण – पोरिफेरा।
  • ऊतक स्तर: कोशिकाएँ मिलकर ऊतक बनाती हैं। उदाहरण – निडेरिया एवं टीनोफोरा।
  • अंग स्तर: विभिन्न ऊतक मिलकर अंग बनाते हैं। उदाहरण – प्लैटीहेल्मिन्थीज।
  • अंग तंत्र स्तर: अंग मिलकर अंग तंत्र बनाते हैं। उदाहरण – ऐनेलिडा से कॉर्डेटा के अनेक जीव।

2. सममिति (Symmetry)

सममितिअर्थउदाहरण
असममिति (Asymmetry)शरीर को किसी भी समतल से दो समान भागों में विभाजित नहीं किया जा सकता।अनेक स्पंज
अरीय सममिति (Radial Symmetry)कई समतलों से शरीर को समान भागों में बाँटा जा सकता है, जो केंद्रीय अक्ष के चारों ओर व्यवस्थित होते हैं।हाइड्रा, जेलीफिश, वयस्क स्टारफिश
द्विपार्श्व सममिति (Bilateral Symmetry)केवल एक विशिष्ट समतल शरीर को दाएँ और बाएँ समान भागों में बाँटता है।केंचुआ, तिलचट्टा, मानव

3. जनन स्तर (Germ Layers)

भ्रूण विकास के दौरान बनने वाली प्राथमिक कोशिका परतों को जनन स्तर कहते हैं।

  • द्विस्तरीय (Diploblastic): दो जनन स्तर – बाह्यत्वचा (Ectoderm) और अंतःत्वचा (Endoderm)। उदाहरण – निडेरिया।
  • त्रिस्तरीय (Triploblastic): तीन जनन स्तर – एक्टोडर्म, मेसोडर्म और एंडोडर्म। उदाहरण – प्लैटीहेल्मिन्थीज से कॉर्डेटा के अधिकांश जीव।

4. देहगुहा (Coelom)

देहभित्ति और आहार नली के बीच उपस्थित द्रवयुक्त गुहा को देहगुहा कहते हैं। वास्तविक देहगुहा मेसोडर्म से आच्छादित होती है।

प्रकारविशेषताउदाहरण
अदेहगुही (Acoelomate)वास्तविक देहगुहा अनुपस्थितप्लैटीहेल्मिन्थीज
कूटदेहगुही (Pseudocoelomate)गुहा पूर्णतः मेसोडर्म से आच्छादित नहींऐस्केल्मिन्थीज/नेमेटोडा
वास्तविक देहगुही (Coelomate)देहगुहा पूर्णतः मेसोडर्म से आच्छादितऐनेलिडा, मोलस्का, आर्थ्रोपोडा, इकाइनोडर्मेटा, कॉर्डेटा

5. खंडीभवन (Metamerism)

जब शरीर बाहरी या आंतरिक रूप से समान या लगभग समान खंडों में विभाजित होता है, तो इसे खंडीभवन कहते हैं। उदाहरण – केंचुआ और अनेक ऐनेलिड। आर्थ्रोपोडा और कॉर्डेटा में भी शरीर का खंडीय संगठन विभिन्न रूपों में पाया जाता है।

6. पृष्ठरज्जु (Notochord)

पृष्ठरज्जु एक लचीली छड़ जैसी संरचना है, जो कॉर्डेटा के जीवों में जीवन की किसी अवस्था में पाई जाती है। नॉन-कॉर्डेटा में पृष्ठरज्जु अनुपस्थित होती है। कशेरुकियों में विकास के दौरान पृष्ठरज्जु का अधिकांश भाग कशेरुक दंड से प्रतिस्थापित हो जाता है।

परीक्षा तथ्य: पोरिफेरा – कोशिकीय संगठन; निडेरिया – ऊतक स्तर; प्लैटीहेल्मिन्थीज – अदेहगुही; नेमेटोडा – कूटदेहगुही; कॉर्डेटा – जीवन की किसी अवस्था में पृष्ठरज्जु।

16. अकशेरुकी एवं कशेरुकी जीव

प्राणी जगत को पृष्ठरज्जु तथा कशेरुक दंड की उपस्थिति या अनुपस्थिति के आधार पर व्यापक रूप से अकशेरुकी और कशेरुकी समूहों में समझा जाता है। अकशेरुकी जीवों में कशेरुक दंड नहीं होता, जबकि कशेरुकियों में विकसित आंतरिक कंकाल और कशेरुक दंड पाया जाता है।

अकशेरुकी (Invertebrates)

ऐसे प्राणी जिनमें कशेरुक दंड (Vertebral Column) नहीं होता, अकशेरुकी कहलाते हैं। प्राणी जगत की अधिकांश ज्ञात प्रजातियाँ अकशेरुकी हैं। इनमें स्पंज, जेलीफिश, केंचुआ, कीट, घोंघा, ऑक्टोपस और स्टारफिश शामिल हैं।

  • कशेरुक दंड अनुपस्थित होता है।
  • शरीर संगठन में अत्यधिक विविधता पाई जाती है।
  • कुछ में बाह्य कंकाल पाया जाता है, जैसे आर्थ्रोपोडा।
  • कुछ में कठोर खोल या कैल्शियमयुक्त संरचना होती है, जैसे अनेक मोलस्क।

कशेरुकी (Vertebrates)

कशेरुकी कॉर्डेटा के अंतर्गत आने वाले ऐसे जीव हैं जिनमें कशेरुक दंड पाया जाता है। इनमें सामान्यतः विकसित मस्तिष्क, मेरुरज्जु, आंतरिक कंकाल और विकसित अंग तंत्र पाए जाते हैं।

  • कशेरुक दंड उपस्थित होता है।
  • अंतःकंकाल अस्थि या उपास्थि का बना हो सकता है।
  • मस्तिष्क और मेरुरज्जु विकसित होते हैं।
  • परिसंचरण, श्वसन और उत्सर्जन के विकसित अंग पाए जाते हैं।

अकशेरुकी एवं कशेरुकी में अंतर

आधारअकशेरुकीकशेरुकी
कशेरुक दंडअनुपस्थितउपस्थित
कंकालबाह्य कंकाल, खोल या अन्य सहायक संरचनाएँ हो सकती हैंआंतरिक कंकाल विकसित
तंत्रिका तंत्रविभिन्न प्रकार का संगठनमस्तिष्क एवं पृष्ठीय मेरुरज्जु विकसित
उदाहरणकेंचुआ, तितली, घोंघा, स्टारफिशमछली, मेंढक, साँप, पक्षी, मानव

कशेरुकियों के प्रमुख वर्ग

वर्गप्रमुख विशेषताउदाहरण
साइक्लोस्टोमेटा (Cyclostomata)जबड़े अनुपस्थित; मुख गोलाकार चूषक जैसालैम्प्रे, हैगफिश
कॉन्ड्रिक्थीज (Chondrichthyes)उपास्थिमय कंकालशार्क, रे
ऑस्टिक्थीज (Osteichthyes)अस्थिमय कंकालरोहू, कतला, समुद्री घोड़ा
एम्फीबिया (Amphibia)जल एवं स्थल दोनों से संबंधित जीवनमेंढक, टोड, सैलामैंडर
रेप्टीलिया (Reptilia)शुष्क, शल्कयुक्त त्वचा; फेफड़ों से श्वसनसाँप, छिपकली, कछुआ
एविस (Aves)पंख, चोंच और अग्रपाद पंखों में परिवर्तितकबूतर, मोर, कौआ
मैमेलिया (Mammalia)स्तन ग्रंथियाँ एवं बालमनुष्य, गाय, चमगादड़, व्हेल
परीक्षा तथ्य: मछलियों में कॉन्ड्रिक्थीज – उपास्थिमय कंकाल; ऑस्टिक्थीज – अस्थिमय कंकाल। स्तनधारियों की प्रमुख पहचान स्तन ग्रंथियाँ और बाल हैं।

17. प्रमुख संघ एवं उनकी विशेषताएँ

अकशेरुकी एवं कशेरुकी प्राणियों के प्रमुख संघों को उनकी शरीर संरचना, सममिति, देहगुहा, खंडीभवन और विशेष अंग तंत्र के आधार पर पहचाना जाता है। प्रतियोगी परीक्षाओं में संघ और उसके उदाहरण का मिलान, विशेष लक्षण तथा जीवों का वर्गीकरण बार-बार पूछा जाता है।

अकशेरुकी प्राणियों के प्रमुख संघ

1. पोरिफेरा (Porifera) – छिद्रधारी

  • इनके शरीर पर अनेक सूक्ष्म छिद्र पाए जाते हैं।
  • मुख्यतः समुद्री, कुछ मीठे जल में भी पाए जाते हैं।
  • कोशिकीय स्तर का संगठन होता है।
  • विशिष्ट जल-नाल तंत्र (Canal System) पाया जाता है।
  • कोएनोसाइट या कॉलर कोशिकाएँ जल प्रवाह एवं भोजन ग्रहण में सहायता करती हैं।
  • उदाहरण – Sycon, Spongilla, Euspongia।

2. निडेरिया / सीलेन्टरेटा (Cnidaria / Coelenterata)

  • जलीय, अधिकांश समुद्री जीव।
  • अरीय सममिति तथा ऊतक स्तर का संगठन।
  • द्विस्तरीय शरीर संगठन।
  • डंक कोशिकाएँ (Cnidoblasts/Nematocysts) पाई जाती हैं।
  • उदाहरण – Hydra, Obelia, Aurelia, Adamsia।

3. टीनोफोरा (Ctenophora)

  • इन्हें कॉम्ब जेली (Comb Jellies) कहा जाता है।
  • मुख्यतः समुद्री और अरीय सममित।
  • गति के लिए आठ कंघीनुमा सिलियरी प्लेटें पाई जाती हैं।
  • चिपकने वाली कोशिकाएँ कोलोब्लास्ट (Colloblasts) होती हैं।
  • उदाहरण – Pleurobrachia, Ctenoplana।

4. प्लैटीहेल्मिन्थीज (Platyhelminthes) – चपटे कृमि

  • शरीर चपटा और द्विपार्श्व सममित होता है।
  • त्रिस्तरीय एवं अदेहगुही होते हैं।
  • अनेक सदस्य परजीवी होते हैं।
  • उदाहरण – Planaria, Taenia, Fasciola।

5. ऐस्केल्मिन्थीज / नेमेटोडा (Aschelminthes / Nematoda)

  • शरीर बेलनाकार और दोनों सिरों पर पतला हो सकता है।
  • द्विपार्श्व सममित, त्रिस्तरीय और कूटदेहगुही।
  • पाचन नली पूर्ण होती है।
  • कुछ स्वतंत्रजीवी और अनेक परजीवी होते हैं।
  • उदाहरण – Ascaris, Wuchereria, Ancylostoma।

6. ऐनेलिडा (Annelida) – खंडित कृमि

  • शरीर खंडों में विभाजित होता है।
  • द्विपार्श्व सममित और वास्तविक देहगुही।
  • बंद रक्त परिसंचरण तंत्र पाया जाता है।
  • उदाहरण – केंचुआ (Pheretima), जोंक (Hirudinaria), Nereis।

7. आर्थ्रोपोडा (Arthropoda) – संधिपाद

  • प्राणी जगत का सबसे बड़ा संघ, ज्ञात प्रजातियों की संख्या के आधार पर।
  • संधियुक्त उपांग (Jointed Appendages) पाए जाते हैं।
  • काइटिनयुक्त बाह्य कंकाल होता है।
  • खुला रक्त परिसंचरण तंत्र पाया जाता है।
  • उदाहरण – तिलचट्टा, मकड़ी, केकड़ा, झींगा, मधुमक्खी, तितली।

8. मोलस्का (Mollusca) – मृदुकाय

  • शरीर कोमल और सामान्यतः अखंडित होता है।
  • पाद (Foot), मेंटल (Mantle) और विसरल मास प्रमुख भाग हैं।
  • अधिकांश में मेंटल द्वारा स्रावित कठोर खोल पाया जाता है।
  • अनेक में भोजन खुरचने के लिए रैडुला (Radula) होता है; द्विकपाटी मोलस्क में सामान्यतः रैडुला अनुपस्थित होता है।
  • उदाहरण – घोंघा, सीप, ऑक्टोपस, स्क्विड।

9. इकाइनोडर्मेटा (Echinodermata) – कंटकचर्मी

  • केवल समुद्री जीव।
  • वयस्क में अरीय, प्रायः पंच-अरीय सममिति; लार्वा में द्विपार्श्व सममिति।
  • कैल्शियमयुक्त अंतःकंकाल पाया जाता है।
  • जल संवहनी तंत्र (Water Vascular System) विशेष लक्षण है।
  • उदाहरण – स्टारफिश (Asterias), सी अर्चिन, सी कुकम्बर।

10. हेमीकॉर्डेटा (Hemichordata)

  • समुद्री कृमि जैसे जीव।
  • शरीर प्रोबोसिस, कॉलर और ट्रंक में विभाजित होता है।
  • ग्रसनी में गिल छिद्र पाए जाते हैं।
  • इनमें वास्तविक पृष्ठरज्जु नहीं होती; स्टोमोकॉर्ड नामक संरचना पाई जाती है।
  • उदाहरण – Balanoglossus, Saccoglossus।

11. कॉर्डेटा (Chordata)

कॉर्डेटा के जीवों में जीवन की किसी न किसी अवस्था में निम्नलिखित प्रमुख लक्षण पाए जाते हैं:

  • पृष्ठरज्जु (Notochord)।
  • पृष्ठीय, खोखली एवं नलिकाकार तंत्रिका रज्जु।
  • ग्रसनी गिल छिद्र (Pharyngeal Gill Slits)।
  • गुदा के पीछे पूँछ (Post-anal Tail)।
  • एंडोस्टाइल या उससे संबंधित थायरॉइड संरचना।

कॉर्डेटा में कशेरुकी तथा कुछ अकशेरुकी कॉर्डेट जैसे यूरोकॉर्डेटा और सेफेलोकॉर्डेटा शामिल हैं। उदाहरण – हर्डमेनिया, एम्फिऑक्सस, मछली, मेंढक, पक्षी एवं मानव।

प्रमुख संघों की तुलनात्मक सारणी

संघमुख्य पहचानउदाहरण
Poriferaशरीर पर छिद्र एवं जल-नाल तंत्रसाइकॉन, स्पॉन्जिला
Cnidariaडंक कोशिकाएँहाइड्रा, ऑरेलिया
Ctenophoraकंघीनुमा प्लेटें एवं कोलोब्लास्टप्ल्यूरोब्रैकिया
Platyhelminthesचपटे, अदेहगुही कृमिप्लैनेरिया, टीनिया
Nematodaबेलनाकार, कूटदेहगुहीएस्कैरिस, वुचेरेरिया
Annelidaखंडित शरीरकेंचुआ, जोंक
Arthropodaसंधियुक्त उपांग, काइटिनयुक्त बाह्य कंकालतिलचट्टा, मकड़ी
Molluscaमृदुकाय, मेंटल एवं पादघोंघा, ऑक्टोपस
Echinodermataजल संवहनी तंत्र, कंटकयुक्त त्वचास्टारफिश, सी अर्चिन
Hemichordataप्रोबोसिस, कॉलर, ट्रंकबैलानोग्लॉसस
Chordataजीवन की किसी अवस्था में पृष्ठरज्जुएम्फिऑक्सस, मानव

कशेरुकी वर्गों की प्रमुख पहचान

वर्गमुख्य लक्षणउदाहरण
Cyclostomataजबड़े रहित, गोल चूषक मुखलैम्प्रे
Chondrichthyesउपास्थिमय कंकाल, प्लेकॉइड शल्कशार्क, रे
Osteichthyesअस्थिमय कंकाल, सामान्यतः ऑपर्कुलमरोहू, कतला
Amphibiaनम त्वचा, जल एवं स्थल से संबंधित जीवनमेंढक, सैलामैंडर
Reptiliaशुष्क शल्कयुक्त त्वचासाँप, छिपकली
Avesपंख, चोंच, अग्रपाद पंखों में रूपांतरितकबूतर, मोर
Mammaliaस्तन ग्रंथियाँ, बाल, बाह्य कान सामान्यतः उपस्थितमानव, गाय, व्हेल
अत्यंत महत्त्वपूर्ण मिलान: पोरिफेरा – छिद्र; निडेरिया – डंक कोशिका; टीनोफोरा – कंघीनुमा प्लेटें; आर्थ्रोपोडा – संधियुक्त पैर; मोलस्का – रैडुला; इकाइनोडर्मेटा – जल संवहनी तंत्र; कॉर्डेटा – पृष्ठरज्जु।

18. जैव विविधता एवं उसका महत्त्व (Biodiversity)

किसी क्षेत्र, पारितंत्र या पूरी पृथ्वी पर पाए जाने वाले जीवों की विविधता को जैव विविधता (Biodiversity) कहते हैं। इसमें पौधे, जंतु, सूक्ष्मजीव, उनकी आनुवंशिक विविधता तथा उनके द्वारा निर्मित पारितंत्र शामिल होते हैं। जैव विविधता पृथ्वी पर पारिस्थितिक संतुलन, खाद्य शृंखलाओं, पोषक तत्वों के चक्र और मानव जीवन के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

जैव विविधता के तीन प्रमुख स्तर

1. आनुवंशिक विविधता (Genetic Diversity)

एक ही प्रजाति के अलग-अलग व्यक्तियों या आबादियों में जीन एवं आनुवंशिक लक्षणों की विविधता को आनुवंशिक विविधता कहते हैं। उदाहरण – धान, गेहूँ और आम की विभिन्न किस्में; एक ही प्रजाति के पौधों में रंग, आकार और रोग प्रतिरोधक क्षमता का अंतर।

2. प्रजातीय विविधता (Species Diversity)

किसी क्षेत्र में पाई जाने वाली विभिन्न प्रजातियों की संख्या और उनकी सापेक्ष प्रचुरता को प्रजातीय विविधता कहते हैं। उदाहरण – किसी वन में पेड़, पक्षी, स्तनधारी, कीट, कवक और सूक्ष्मजीवों की अनेक प्रजातियाँ।

3. पारितंत्र विविधता (Ecosystem Diversity)

किसी भौगोलिक क्षेत्र में पाए जाने वाले विभिन्न पारितंत्रों की विविधता को पारितंत्र विविधता कहते हैं। उदाहरण – वन, घासभूमि, मरुस्थल, नदियाँ, झीलें, आर्द्रभूमि, मैंग्रोव और समुद्री पारितंत्र।

स्तरअर्थउदाहरण
आनुवंशिक विविधताएक ही प्रजाति के भीतर जीनों का अंतरधान की विभिन्न किस्में
प्रजातीय विविधताकिसी क्षेत्र में अलग-अलग प्रजातियों की विविधतावन में अनेक प्रकार के जीव
पारितंत्र विविधताअलग-अलग पारितंत्रों की विविधतावन, नदी, समुद्र, मरुस्थल

जैव विविधता का महत्त्व

  • पारिस्थितिक संतुलन: खाद्य शृंखला, खाद्य जाल और पोषक तत्वों के चक्र को बनाए रखने में सहायता करती है।
  • खाद्य सुरक्षा: फसलें, फल, सब्जियाँ, मछलियाँ और पशुधन जैव विविधता पर निर्भर हैं।
  • औषधीय महत्त्व: अनेक औषधियों के स्रोत पौधे, कवक और सूक्ष्मजीव हैं।
  • आर्थिक महत्त्व: कृषि, वानिकी, मत्स्य पालन, पर्यटन और औषधि उद्योग को आधार प्रदान करती है।
  • आनुवंशिक संसाधन: फसल सुधार, रोग प्रतिरोधी किस्मों और जलवायु अनुकूलन में उपयोगी।
  • पर्यावरणीय सेवाएँ: परागण, जल शुद्धिकरण, मृदा निर्माण, कार्बन संचय और जलवायु नियमन में योगदान।
  • सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक महत्त्व: प्राकृतिक विरासत, शिक्षा, अनुसंधान और पारंपरिक ज्ञान का आधार।

जैव विविधता के लिए प्रमुख खतरे

  • आवास विनाश (Habitat Loss): वनों की कटाई, शहरीकरण, सड़क एवं बाँध निर्माण से प्राकृतिक आवास नष्ट होते हैं।
  • आवास विखंडन (Habitat Fragmentation): बड़े आवास छोटे-छोटे पृथक भागों में बँट जाते हैं, जिससे जीवों का आवागमन और प्रजनन प्रभावित होता है।
  • अतिदोहन (Overexploitation): शिकार, अत्यधिक मछली पकड़ना और वन संसाधनों का असंतुलित उपयोग।
  • विदेशी आक्रामक प्रजातियाँ (Invasive Alien Species): बाहरी प्रजातियाँ स्थानीय प्रजातियों और पारितंत्रों को नुकसान पहुँचा सकती हैं।
  • प्रदूषण: जल, वायु, मृदा एवं रासायनिक प्रदूषण जीवों के अस्तित्व को प्रभावित करते हैं।
  • जलवायु परिवर्तन: तापमान, वर्षा, समुद्र स्तर और आवास की दशाओं में बदलाव।

जैव विविधता संरक्षण के उपाय

1. स्व-स्थाने संरक्षण (In-situ Conservation)

जब जीवों और उनकी आबादियों को उनके प्राकृतिक आवास में संरक्षित किया जाता है, तो इसे स्व-स्थाने संरक्षण कहते हैं। इसमें राष्ट्रीय उद्यान, वन्यजीव अभयारण्य, जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र और सामुदायिक संरक्षित क्षेत्र शामिल हैं।

2. बाह्य-स्थाने संरक्षण (Ex-situ Conservation)

जब संकटग्रस्त जीवों या पौधों को उनके प्राकृतिक आवास से बाहर नियंत्रित परिस्थितियों में संरक्षित किया जाता है, तो इसे बाह्य-स्थाने संरक्षण कहते हैं। इसमें चिड़ियाघर, वनस्पति उद्यान, बीज बैंक, जीन बैंक, ऊतक संवर्धन और प्रजनन केंद्र शामिल हैं।

संरक्षण का प्रकारअर्थउदाहरण
स्व-स्थानेप्राकृतिक आवास में संरक्षणराष्ट्रीय उद्यान, अभयारण्य, जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र
बाह्य-स्थानेप्राकृतिक आवास से बाहर संरक्षणचिड़ियाघर, वनस्पति उद्यान, बीज बैंक, जीन बैंक

जैव विविधता हॉटस्पॉट (Biodiversity Hotspots)

जैव विविधता हॉटस्पॉट ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ स्थानिक (Endemic) प्रजातियों की संख्या बहुत अधिक होती है और जहाँ प्राकृतिक आवास का गंभीर विनाश हुआ है। नॉर्मन मायर्स ने इस अवधारणा को विकसित किया। किसी क्षेत्र को हॉटस्पॉट के रूप में मान्यता देने के लिए सामान्यतः कम-से-कम 1,500 स्थानिक संवहनी पौधों की प्रजातियाँ और मूल प्राकृतिक वनस्पति का कम-से-कम 70 प्रतिशत नुकसान होना आवश्यक है।

भारत से संबंधित चार जैव विविधता हॉटस्पॉट

हॉटस्पॉटभारत में संबंधित क्षेत्र
हिमालय (Himalaya)भारतीय हिमालयी क्षेत्र
इंडो-बर्मा (Indo-Burma)पूर्वोत्तर भारत के बड़े भाग
पश्चिमी घाट एवं श्रीलंका (Western Ghats and Sri Lanka)भारत के पश्चिमी घाट
सुंडालैंड (Sundaland)भारत में निकोबार द्वीप समूह का हिस्सा

जैव विविधता से संबंधित महत्त्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय समझौते

  • जैव विविधता अभिसमय (Convention on Biological Diversity – CBD): 1992 में रियो पृथ्वी सम्मेलन में हस्ताक्षर के लिए प्रस्तुत; इसका उद्देश्य जैव विविधता संरक्षण, उसके घटकों का सतत उपयोग तथा आनुवंशिक संसाधनों से प्राप्त लाभों का न्यायसंगत बँटवारा है।
  • रामसर अभिसमय (Ramsar Convention): अंतरराष्ट्रीय महत्त्व की आर्द्रभूमियों के संरक्षण और विवेकपूर्ण उपयोग से संबंधित समझौता।
  • CITES: वन्य जीवों और वनस्पतियों की संकटग्रस्त प्रजातियों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार को नियंत्रित करने वाला समझौता।
  • IUCN: प्रकृति संरक्षण और प्रजातियों की संरक्षण स्थिति के आकलन के लिए प्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय संगठन।

IUCN की रेड लिस्ट की प्रमुख श्रेणियाँ

श्रेणीअर्थ
EX – Extinctविलुप्त
EW – Extinct in the Wildवन्य अवस्था में विलुप्त
CR – Critically Endangeredअति संकटग्रस्त
EN – Endangeredसंकटग्रस्त
VU – Vulnerableसुभेद्य
NT – Near Threatenedसंकट के निकट
LC – Least Concernकम चिंतनीय
DD – Data Deficientआँकड़ों की कमी
NE – Not Evaluatedमूल्यांकन नहीं किया गया
परीक्षा तथ्य: जैव विविधता के तीन स्तर – आनुवंशिक, प्रजातीय और पारितंत्र विविधता। संरक्षण – स्व-स्थाने और बाह्य-स्थाने। भारत के चार हॉटस्पॉट – हिमालय, इंडो-बर्मा, पश्चिमी घाट-श्रीलंका और सुंडालैंड।

विशेष परीक्षा तथ्य एवं त्वरित मिलान

प्रश्न में दिया संकेतसही उत्तर
आधुनिक वर्गिकी के जनककैरोलस लिनियस
पाँच-जगत वर्गीकरणआर. एच. व्हिटेकर – 1969
प्रोटिस्टा जगत का प्रस्तावअर्न्स्ट हेकेल
तीन-डोमेन प्रणालीकार्ल वूज़ एवं सहयोगी
वर्गीकरण की मूल इकाईजाति (Species)
द्विनाम पद्धतिदो शब्द
मानव का वैज्ञानिक नामHomo sapiens
प्रोकैरियोटिक जगत (पाँच-जगत प्रणाली)मोनेरा
कोशिका भित्ति रहित सूक्ष्म जीवमाइकोप्लाज्मा
नील-हरित शैवालसायनोबैक्टीरिया
डायटम की कोशिका भित्तिसिलिका
लाल ज्वारकुछ डाइनोफ्लैजिलेट्स
मलेरिया का कारकPlasmodium
कवक की कोशिका भित्तिकाइटिन
थैली कवकऐस्कोमाइसीट्स
ब्रेड मोल्डRhizopus
पादप जगत के उभयचरब्रायोफाइटा
संवहनी क्रिप्टोगैमटेरिडोफाइटा
नग्न बीजजिम्नोस्पर्म
द्विनिषेचनएंजियोस्पर्म
एकबीजपत्री पौधे का उदाहरणमक्का, गेहूँ, धान
द्विबीजपत्री पौधे का उदाहरणमटर, चना, आम
प्राणी जगत का सबसे बड़ा संघआर्थ्रोपोडा
जल संवहनी तंत्रइकाइनोडर्मेटा
संधियुक्त उपांगआर्थ्रोपोडा
मृदुकाय प्राणीमोलस्का
पृष्ठरज्जुकॉर्डेटा
स्तन ग्रंथियाँमैमेलिया
जैव विविधता के तीन स्तरआनुवंशिक, प्रजातीय, पारितंत्र
प्राकृतिक आवास में संरक्षणस्व-स्थाने संरक्षण
प्राकृतिक आवास के बाहर संरक्षणबाह्य-स्थाने संरक्षण

अभ्यास प्रश्न (MCQs) – 50 महत्त्वपूर्ण प्रश्न

ये प्रश्न UP PET, UPSSSC, SSC, Railway, Police, UP SI, Lekhpal, RO/ARO, UPPSC तथा अन्य राज्य स्तरीय परीक्षाओं के सामान्य विज्ञान स्तर को ध्यान में रखकर तैयार किए गए हैं। प्रत्येक प्रश्न के नीचे उत्तर एवं संक्षिप्त व्याख्या दी गई है।

प्रश्न 1. आधुनिक वर्गिकी का जनक किसे कहा जाता है?

(A) अरस्तू
(B) कैरोलस लिनियस
(C) चार्ल्स डार्विन
(D) ग्रेगर मेंडल
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: (B) कैरोलस लिनियस।
लिनियस ने जीवों के वैज्ञानिक नामकरण और वर्गीकरण को व्यवस्थित रूप दिया।

प्रश्न 2. पाँच-जगत वर्गीकरण किस वैज्ञानिक ने प्रस्तुत किया था?

(A) कार्ल वूज़
(B) अर्न्स्ट हेकेल
(C) आर. एच. व्हिटेकर
(D) लिनियस
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: (C) आर. एच. व्हिटेकर।
व्हिटेकर ने 1969 में पाँच-जगत वर्गीकरण प्रस्तुत किया।

प्रश्न 3. पाँच-जगत वर्गीकरण में निम्नलिखित में से कौन-सा जगत शामिल नहीं है?

(A) मोनेरा
(B) प्रोटिस्टा
(C) कवक
(D) वायरस
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: (D) वायरस।
व्हिटेकर के पाँच-जगत वर्गीकरण में मोनेरा, प्रोटिस्टा, कवक, पादप और जंतु जगत शामिल हैं। वायरस अकोशिकीय होते हैं और इस प्रणाली में किसी जगत में नहीं रखे गए।

प्रश्न 4. वर्गीकरण की मूल इकाई कौन-सी है?

(A) जगत
(B) संघ
(C) जाति
(D) कुल
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: (C) जाति।
जाति (Species) वर्गीकरण की मूल इकाई है।

प्रश्न 5. द्विनाम नामकरण पद्धति में वैज्ञानिक नाम कितने शब्दों का होता है?

(A) एक
(B) दो
(C) तीन
(D) चार
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: (B) दो।
पहला शब्द वंश और दूसरा शब्द जाति सूचक विशेषण होता है।

प्रश्न 6. मानव का वैज्ञानिक नाम क्या है?

(A) Homo erectus
(B) Homo sapiens
(C) Panthera leo
(D) Canis familiaris
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: (B) Homo sapiens।
मनुष्य का स्वीकृत वैज्ञानिक नाम Homo sapiens है।

प्रश्न 7. वैज्ञानिक नाम में पहला शब्द किसे दर्शाता है?

(A) कुल
(B) वंश
(C) गण
(D) वर्ग
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: (B) वंश।
द्विनाम नामकरण में पहला शब्द Genus और दूसरा Specific Epithet होता है।

प्रश्न 8. निम्नलिखित में से कौन-सा जीव प्रोकैरियोटिक है?

(A) अमीबा
(B) यीस्ट
(C) जीवाणु
(D) पैरामीशियम
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: (C) जीवाणु।
जीवाणु प्रोकैरियोटिक होते हैं। अमीबा, यीस्ट और पैरामीशियम यूकैरियोटिक हैं।

प्रश्न 9. मोनेरा जगत के जीवों में कौन-सी संरचना अनुपस्थित होती है?

(A) कोशिका झिल्ली
(B) राइबोसोम
(C) झिल्लीबद्ध केंद्रक
(D) कोशिकाद्रव्य
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: (C) झिल्लीबद्ध केंद्रक।
मोनेरा के जीव प्रोकैरियोटिक होते हैं और इनमें सुसंगठित केंद्रक नहीं होता।

प्रश्न 10. माइकोप्लाज्मा की प्रमुख विशेषता क्या है?

(A) कोशिका भित्ति का अभाव
(B) केंद्रक का अभाव
(C) क्लोरोफिल की अधिकता
(D) बहुकोशिकीय होना
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: (A) कोशिका भित्ति का अभाव।
माइकोप्लाज्मा में कोशिका भित्ति नहीं होती, इसलिए इनका आकार परिवर्तनशील हो सकता है।

प्रश्न 11. नील-हरित शैवाल वास्तव में किस समूह के सदस्य हैं?

(A) कवक
(B) सायनोबैक्टीरिया
(C) प्रोटोजोआ
(D) ब्रायोफाइटा
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: (B) सायनोबैक्टीरिया।
ये प्रकाश संश्लेषण करने वाले प्रोकैरियोटिक जीवाणु हैं।

प्रश्न 12. डायटम की कोशिका भित्ति मुख्यतः किस पदार्थ की बनी होती है?

(A) काइटिन
(B) सेल्यूलोज
(C) सिलिका
(D) लिग्निन
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: (C) सिलिका।
डायटम की कोशिका भित्ति सिलिका की दो आधी संरचनाओं से बनी होती है।

प्रश्न 13. लाल ज्वार (Red Tide) सामान्यतः किसके कारण उत्पन्न हो सकता है?

(A) डाइनोफ्लैजिलेट्स
(B) ब्रायोफाइटा
(C) फर्न
(D) यीस्ट
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: (A) डाइनोफ्लैजिलेट्स।
कुछ डाइनोफ्लैजिलेट्स के अत्यधिक प्रसार से समुद्री जल का रंग लाल दिखाई दे सकता है।

प्रश्न 14. यूग्लीना में कोशिका भित्ति के स्थान पर क्या पाया जाता है?

(A) काइटिन
(B) पेलिकल
(C) सिलिका
(D) लिग्निन
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: (B) पेलिकल।
यूग्लीना में लचीला प्रोटीनयुक्त पेलिकल पाया जाता है।

प्रश्न 15. मलेरिया रोग का कारक कौन है?

(A) अमीबा
(B) प्लाज्मोडियम
(C) पैरामीशियम
(D) ट्रिपैनोसोमा
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: (B) प्लाज्मोडियम।
मलेरिया रोग प्लाज्मोडियम नामक प्रोटोजोआ परजीवी से होता है।

प्रश्न 16. कवक की कोशिका भित्ति मुख्यतः किसकी बनी होती है?

(A) सेल्यूलोज
(B) काइटिन
(C) सिलिका
(D) स्टार्च
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: (B) काइटिन।
कवक की कोशिका भित्ति मुख्यतः काइटिनयुक्त होती है।

प्रश्न 17. कवक के तंतु को क्या कहा जाता है?

(A) माइसीलियम
(B) हाइफा
(C) थैलस
(D) राइजॉइड
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: (B) हाइफा।
कवक के तंतु हाइफा कहलाते हैं और इनका जाल माइसीलियम कहलाता है।

प्रश्न 18. ब्रेड बनाने में किस कवक का उपयोग किया जाता है?

(A) राइजोपस
(B) सैकरोमाइसीज
(C) पेनिसिलियम
(D) एगारिकस
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: (B) सैकरोमाइसीज।
यीस्ट Saccharomyces cerevisiae किण्वन द्वारा कार्बन डाइऑक्साइड उत्पन्न करता है, जिससे ब्रेड फूलती है।

प्रश्न 19. पेनिसिलिन की खोज किस कवक से संबंधित है?

(A) पेनिसिलियम
(B) राइजोपस
(C) म्यूकर
(D) एगारिकस
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: (A) पेनिसिलियम।
अलेक्जेंडर फ्लेमिंग ने Penicillium से संबंधित फफूँद के जीवाणुरोधी प्रभाव का अवलोकन किया था।

प्रश्न 20. लाइकेन किन दो जीवों का सहजीवी संघटन है?

(A) जीवाणु एवं वायरस
(B) शैवाल/सायनोबैक्टीरिया एवं कवक
(C) कवक एवं प्रोटोजोआ
(D) पौधा एवं जंतु
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: (B) शैवाल/सायनोबैक्टीरिया एवं कवक।
लाइकेन में प्रकाश संश्लेषी साथी भोजन बनाता है और कवक सुरक्षा एवं जल उपलब्ध कराने में मदद करता है।

प्रश्न 21. पौधों के पारंपरिक वर्गीकरण में थैलोफाइटा की प्रमुख विशेषता क्या है?

(A) बीज फल के भीतर बंद
(B) वास्तविक जड़, तना एवं पत्ती का अभाव
(C) पुष्पों की उपस्थिति
(D) विकसित संवहनी ऊतक
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: (B) वास्तविक जड़, तना एवं पत्ती का अभाव।
थैलोफाइटा में शरीर थैलस के रूप में होता है।

प्रश्न 22. पादप जगत के उभयचर किसे कहा जाता है?

(A) थैलोफाइटा
(B) ब्रायोफाइटा
(C) टेरिडोफाइटा
(D) जिम्नोस्पर्म
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: (B) ब्रायोफाइटा।
ये स्थल पर रहते हैं, लेकिन लैंगिक प्रजनन के लिए जल पर निर्भर होते हैं।

प्रश्न 23. निम्नलिखित में से किसमें संवहनी ऊतक उपस्थित होते हैं, लेकिन बीज नहीं बनते?

(A) ब्रायोफाइटा
(B) टेरिडोफाइटा
(C) थैलोफाइटा
(D) कवक
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: (B) टेरिडोफाइटा।
टेरिडोफाइटा में जाइलम एवं फ्लोएम होते हैं, लेकिन बीज नहीं बनते।

प्रश्न 24. निम्नलिखित में से कौन-सा विषमबीजाणुक टेरिडोफाइट है?

(A) स्पाइरोगाइरा
(B) सेलाजिनेला
(C) फ्यूनेरिया
(D) रिक्सिया
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: (B) सेलाजिनेला।
सेलाजिनेला में लघुबीजाणु और गुरुबीजाणु बनते हैं।

प्रश्न 25. नग्न बीज किस पादप समूह की विशेषता है?

(A) ब्रायोफाइटा
(B) टेरिडोफाइटा
(C) जिम्नोस्पर्म
(D) एंजियोस्पर्म
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: (C) जिम्नोस्पर्म।
जिम्नोस्पर्म के बीज अंडाशय या फल के भीतर बंद नहीं होते।

प्रश्न 26. निम्नलिखित में से कौन-सा जिम्नोस्पर्म का उदाहरण है?

(A) आम
(B) मटर
(C) पाइनस
(D) गेहूँ
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: (C) पाइनस।
पाइनस एक शंकुधारी जिम्नोस्पर्म है।

प्रश्न 27. द्विनिषेचन किस समूह की विशिष्ट विशेषता है?

(A) ब्रायोफाइटा
(B) टेरिडोफाइटा
(C) जिम्नोस्पर्म
(D) एंजियोस्पर्म
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: (D) एंजियोस्पर्म।
आवृतबीजी पौधों में दो नर युग्मकों के दो अलग संलयन होते हैं।

प्रश्न 28. एकबीजपत्री पौधों में सामान्यतः किस प्रकार का शिरा-विन्यास पाया जाता है?

(A) जालिकावत
(B) समानांतर
(C) द्विशाखित
(D) अनियमित
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: (B) समानांतर।
गेहूँ, धान और मक्का जैसे एकबीजपत्री पौधों में सामान्यतः समानांतर शिरा-विन्यास होता है।

प्रश्न 29. द्विबीजपत्री पौधों में सामान्यतः किस प्रकार की जड़ पाई जाती है?

(A) रेशेदार
(B) मूसला
(C) वायवीय
(D) परजीवी
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: (B) मूसला।
मटर, चना और सरसों जैसे द्विबीजपत्री पौधों में सामान्यतः मूसला जड़ तंत्र होता है।

प्रश्न 30. निम्नलिखित में से कौन-सा एकबीजपत्री पौधा है?

(A) मटर
(B) चना
(C) मक्का
(D) सरसों
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: (C) मक्का।
मक्का एकबीजपत्री पौधा है, जबकि मटर, चना और सरसों द्विबीजपत्री हैं।

प्रश्न 31. प्राणी जगत का सबसे बड़ा संघ कौन-सा है?

(A) मोलस्का
(B) ऐनेलिडा
(C) आर्थ्रोपोडा
(D) कॉर्डेटा
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: (C) आर्थ्रोपोडा।
ज्ञात प्रजातियों की संख्या के आधार पर आर्थ्रोपोडा प्राणी जगत का सबसे बड़ा संघ है।

प्रश्न 32. स्पंज किस संघ के अंतर्गत आते हैं?

(A) पोरिफेरा
(B) निडेरिया
(C) मोलस्का
(D) ऐनेलिडा
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: (A) पोरिफेरा।
स्पंज के शरीर पर अनेक छिद्र होते हैं और इनमें जल-नाल तंत्र पाया जाता है।

प्रश्न 33. निडेरिया संघ के जीवों में कौन-सी विशिष्ट कोशिकाएँ पाई जाती हैं?

(A) कोलोब्लास्ट
(B) निडोब्लास्ट
(C) कॉन्ड्रोसाइट
(D) ऑस्टियोसाइट
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: (B) निडोब्लास्ट।
निडेरिया में डंक कोशिकाएँ पाई जाती हैं, जिनमें निमेटोसिस्ट होते हैं।

प्रश्न 34. टीनोफोरा में गति के लिए कौन-सी संरचनाएँ पाई जाती हैं?

(A) कूटपाद
(B) संधियुक्त पैर
(C) कंघीनुमा सिलियरी प्लेटें
(D) पंख
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: (C) कंघीनुमा सिलियरी प्लेटें।
टीनोफोरा को कॉम्ब जेली भी कहा जाता है।

प्रश्न 35. प्लैटीहेल्मिन्थीज के जीव सामान्यतः किस प्रकार के होते हैं?

(A) बेलनाकार कृमि
(B) चपटे कृमि
(C) खंडित कृमि
(D) संधिपाद
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: (B) चपटे कृमि।
प्लैटीहेल्मिन्थीज को फ्लैटवर्म भी कहा जाता है।

प्रश्न 36. कूटदेहगुहा (Pseudocoelom) किस संघ की प्रमुख विशेषता है?

(A) पोरिफेरा
(B) प्लैटीहेल्मिन्थीज
(C) नेमेटोडा
(D) इकाइनोडर्मेटा
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: (C) नेमेटोडा।
नेमेटोडा में कूटदेहगुहा पाई जाती है।

प्रश्न 37. केंचुआ किस संघ का सदस्य है?

(A) ऐनेलिडा
(B) आर्थ्रोपोडा
(C) मोलस्का
(D) कॉर्डेटा
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: (A) ऐनेलिडा।
केंचुए का शरीर खंडित होता है और इसमें वास्तविक देहगुहा पाई जाती है।

प्रश्न 38. संधियुक्त उपांग किस संघ की प्रमुख विशेषता है?

(A) मोलस्का
(B) आर्थ्रोपोडा
(C) ऐनेलिडा
(D) पोरिफेरा
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: (B) आर्थ्रोपोडा।
आर्थ्रोपोडा में संधियुक्त उपांग और काइटिनयुक्त बाह्य कंकाल पाया जाता है।

प्रश्न 39. रैडुला (Radula) सामान्यतः किस संघ में पाया जाता है?

(A) मोलस्का
(B) ऐनेलिडा
(C) पोरिफेरा
(D) कॉर्डेटा
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: (A) मोलस्का।
रैडुला अनेक मोलस्क में भोजन खुरचने वाली संरचना है। द्विकपाटी मोलस्क में यह सामान्यतः अनुपस्थित होती है।

प्रश्न 40. जल संवहनी तंत्र (Water Vascular System) किस संघ की विशेषता है?

(A) मोलस्का
(B) इकाइनोडर्मेटा
(C) आर्थ्रोपोडा
(D) प्लैटीहेल्मिन्थीज
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: (B) इकाइनोडर्मेटा।
स्टारफिश जैसे जीवों में जल संवहनी तंत्र पाया जाता है।

प्रश्न 41. पृष्ठरज्जु (Notochord) किस संघ का प्रमुख लक्षण है?

(A) आर्थ्रोपोडा
(B) मोलस्का
(C) कॉर्डेटा
(D) ऐनेलिडा
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: (C) कॉर्डेटा।
कॉर्डेटा के जीवों में जीवन की किसी अवस्था में पृष्ठरज्जु पाई जाती है।

प्रश्न 42. निम्नलिखित में से कौन-सा कशेरुकी वर्ग उपास्थिमय कंकाल वाला है?

(A) ऑस्टिक्थीज
(B) कॉन्ड्रिक्थीज
(C) एम्फीबिया
(D) मैमेलिया
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: (B) कॉन्ड्रिक्थीज।
शार्क और रे जैसे जीवों में उपास्थिमय कंकाल पाया जाता है।

प्रश्न 43. अस्थिमय कंकाल वाली मछलियाँ किस वर्ग में आती हैं?

(A) कॉन्ड्रिक्थीज
(B) ऑस्टिक्थीज
(C) एम्फीबिया
(D) रेप्टीलिया
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: (B) ऑस्टिक्थीज।
रोहू और कतला जैसी अस्थिमय मछलियाँ ऑस्टिक्थीज में आती हैं।

प्रश्न 44. स्तनधारियों की प्रमुख पहचान क्या है?

(A) पंख
(B) गलफड़े
(C) स्तन ग्रंथियाँ
(D) शल्कयुक्त त्वचा
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: (C) स्तन ग्रंथियाँ।
स्तनधारियों की मादा में दुग्ध उत्पादन करने वाली स्तन ग्रंथियाँ पाई जाती हैं।

प्रश्न 45. जैव विविधता के कितने प्रमुख स्तर माने जाते हैं?

(A) दो
(B) तीन
(C) चार
(D) पाँच
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: (B) तीन।
आनुवंशिक, प्रजातीय और पारितंत्र विविधता इसके तीन प्रमुख स्तर हैं।

प्रश्न 46. किसी एक प्रजाति के भीतर आनुवंशिक अंतर को क्या कहते हैं?

(A) पारितंत्र विविधता
(B) प्रजातीय विविधता
(C) आनुवंशिक विविधता
(D) आवास विविधता
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: (C) आनुवंशिक विविधता।
एक ही प्रजाति के व्यक्तियों या आबादियों के जीनों में अंतर आनुवंशिक विविधता कहलाता है।

प्रश्न 47. राष्ट्रीय उद्यान और वन्यजीव अभयारण्य किस प्रकार के संरक्षण के उदाहरण हैं?

(A) बाह्य-स्थाने संरक्षण
(B) स्व-स्थाने संरक्षण
(C) कृत्रिम चयन
(D) ऊतक संवर्धन
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: (B) स्व-स्थाने संरक्षण।
इनमें जीवों को उनके प्राकृतिक आवास में संरक्षित किया जाता है।

प्रश्न 48. निम्नलिखित में से कौन-सा बाह्य-स्थाने संरक्षण का उदाहरण है?

(A) राष्ट्रीय उद्यान
(B) वन्यजीव अभयारण्य
(C) बीज बैंक
(D) जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: (C) बीज बैंक।
बीज बैंक में पौधों के बीजों को प्राकृतिक आवास से बाहर संरक्षित किया जाता है।

प्रश्न 49. भारत से संबंधित जैव विविधता हॉटस्पॉट की संख्या कितनी है?

(A) दो
(B) तीन
(C) चार
(D) पाँच
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: (C) चार।
भारत से संबंधित चार हॉटस्पॉट हैं – हिमालय, इंडो-बर्मा, पश्चिमी घाट-श्रीलंका और सुंडालैंड (निकोबार क्षेत्र)।

प्रश्न 50. जैव विविधता अभिसमय (CBD) किस वर्ष रियो पृथ्वी सम्मेलन में हस्ताक्षर के लिए प्रस्तुत किया गया था?

(A) 1972
(B) 1985
(C) 1992
(D) 2002
उत्तर एवं व्याख्या देखें
सही उत्तर: (C) 1992।
जैव विविधता अभिसमय 1992 में रियो डी जेनेरियो पृथ्वी सम्मेलन में हस्ताक्षर के लिए प्रस्तुत किया गया था।

त्वरित पुनरावृत्ति (Quick Revision)

  • वर्गिकी – पहचान, नामकरण और वर्गीकरण का अध्ययन।
  • सिस्टमैटिक्स – जीवों की विविधता एवं विकासीय संबंधों का व्यापक अध्ययन।
  • आधुनिक वर्गिकी के जनक – कैरोलस लिनियस।
  • पाँच-जगत वर्गीकरण – आर. एच. व्हिटेकर, 1969।
  • द्विनाम नामकरण – दो शब्द; वंश + जाति सूचक विशेषण।
  • वर्गीकरण की मूल इकाई – जाति।
  • मोनेरा – प्रोकैरियोटिक जीव।
  • सायनोबैक्टीरिया – प्रकाश संश्लेषी प्रोकैरियोट।
  • माइकोप्लाज्मा – कोशिका भित्ति अनुपस्थित।
  • प्रोटिस्टा – मुख्यतः एककोशिकीय यूकैरियोट।
  • डायटम – सिलिका की कोशिका भित्ति।
  • यूग्लीना – पेलिकल।
  • प्लाज्मोडियम – मलेरिया का कारक।
  • कवक – परपोषी, कोशिका भित्ति काइटिनयुक्त।
  • लाइकेन – शैवाल/सायनोबैक्टीरिया और कवक का सहजीवन।
  • थैलोफाइटा – वास्तविक जड़, तना एवं पत्ती का अभाव।
  • ब्रायोफाइटा – पादप जगत के उभयचर।
  • टेरिडोफाइटा – संवहनी बीजरहित पौधे।
  • जिम्नोस्पर्म – नग्न बीज।
  • एंजियोस्पर्म – फल के भीतर बंद बीज; द्विनिषेचन।
  • एकबीजपत्री – एक बीजपत्र, समानांतर शिरा-विन्यास।
  • द्विबीजपत्री – दो बीजपत्र, सामान्यतः जालिकावत शिरा-विन्यास।
  • आर्थ्रोपोडा – प्राणी जगत का सबसे बड़ा संघ।
  • मोलस्का – मृदुकाय; अनेक में रैडुला।
  • इकाइनोडर्मेटा – जल संवहनी तंत्र।
  • कॉर्डेटा – जीवन की किसी अवस्था में पृष्ठरज्जु।
  • कशेरुकी – कशेरुक दंड उपस्थित।
  • जैव विविधता – आनुवंशिक, प्रजातीय और पारितंत्र स्तर।
  • स्व-स्थाने संरक्षण – प्राकृतिक आवास में संरक्षण।
  • बाह्य-स्थाने संरक्षण – प्राकृतिक आवास से बाहर संरक्षण।
  • भारत के चार हॉटस्पॉट – हिमालय, इंडो-बर्मा, पश्चिमी घाट-श्रीलंका, सुंडालैंड।
  • CBD – जैव विविधता अभिसमय, 1992।

संदर्भ एवं अध्ययन सामग्री

इस अध्याय की वैज्ञानिक अवधारणाओं, वर्गीकरण, पादप जगत, प्राणी जगत और जैव विविधता के अध्ययन के लिए निम्नलिखित शैक्षणिक एवं आधिकारिक स्रोत उपयोगी हैं।

प्रश्नों की प्रामाणिकता: इस अध्याय के 50 MCQ मौलिक अभ्यास प्रश्न हैं। इन्हें वास्तविक UPSSSC, UP Police या अन्य परीक्षा के PYQ के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया है। किसी प्रश्न को वास्तविक PYQ तभी चिह्नित किया जाना चाहिए जब मूल प्रश्नपत्र या आधिकारिक उत्तर-कुंजी से उसका मिलान हो।

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