अध्याय 20. पारिस्थितिकी, पर्यावरण एवं जैव विविधता संरक्षण
Ecology, Environment and Biodiversity Conservation
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1. पारिस्थितिकी का अर्थ एवं क्षेत्र (Meaning and Scope of Ecology)
पारिस्थितिकी (Ecology) जीव विज्ञान की वह शाखा है जिसमें जीवों तथा उनके जैविक और अजैविक पर्यावरण के बीच पारस्परिक संबंधों का अध्ययन किया जाता है। इसमें यह समझा जाता है कि जीव अपने आसपास के वातावरण से किस प्रकार प्रभावित होते हैं और स्वयं पर्यावरण को किस प्रकार प्रभावित करते हैं।
पारिस्थितिकी शब्द का प्रयोग जर्मन जीवविज्ञानी अर्न्स्ट हैकेल (Ernst Haeckel) ने वर्ष 1866 में किया था। यह शब्द ग्रीक भाषा के दो शब्दों Oikos (घर या निवास) और Logos (अध्ययन) से मिलकर बना है। इस प्रकार पारिस्थितिकी का शाब्दिक अर्थ जीवों के निवास स्थान या उनके पर्यावरण का अध्ययन है।
पारिस्थितिकी का क्षेत्र
- जीवों और पर्यावरण के बीच संबंधों का अध्ययन।
- जीवों के वितरण एवं संख्या को प्रभावित करने वाले कारकों का अध्ययन।
- खाद्य श्रृंखला, खाद्य जाल एवं ऊर्जा प्रवाह का अध्ययन।
- पारितंत्र की संरचना और कार्यप्रणाली का अध्ययन।
- पोषक तत्त्वों के चक्रण एवं पदार्थों के पुनर्चक्रण का अध्ययन।
- जैव विविधता तथा उसके संरक्षण का अध्ययन।
- प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन एवं पर्यावरणीय समस्याओं का अध्ययन।
- प्राकृतिक संसाधनों के सतत उपयोग और प्रबंधन का अध्ययन।
पारिस्थितिकी की प्रमुख शाखाएँ
| शाखा | अर्थ |
|---|---|
| स्वजातीय पारिस्थितिकी (Autecology) | किसी एक जीव या एक प्रजाति और उसके पर्यावरण के संबंधों का अध्ययन। |
| समुदाय पारिस्थितिकी (Synecology) | किसी क्षेत्र में विभिन्न प्रजातियों के समुदाय तथा उनके पारस्परिक संबंधों का अध्ययन। |
| जनसंख्या पारिस्थितिकी | किसी प्रजाति की जनसंख्या, घनत्व, वृद्धि और वितरण का अध्ययन। |
| पारितंत्र पारिस्थितिकी | पारितंत्र में ऊर्जा प्रवाह और पोषक तत्त्वों के चक्रण का अध्ययन। |
| मानव पारिस्थितिकी | मानव समाज और प्राकृतिक एवं निर्मित पर्यावरण के संबंधों का अध्ययन। |
2. पारिस्थितिक संगठन के स्तर (Levels of Ecological Organization)
प्रकृति में जीवों का संगठन कई स्तरों पर पाया जाता है। एक अकेले जीव से लेकर संपूर्ण जैवमंडल तक विभिन्न स्तर एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। इन स्तरों को पारिस्थितिक संगठन के स्तर कहते हैं।
| स्तर | अर्थ | उदाहरण |
|---|---|---|
| जीव (Organism) | किसी प्रजाति का एक स्वतंत्र जीव। | एक हिरण, एक पीपल का पेड़। |
| जनसंख्या (Population) | एक निश्चित क्षेत्र में एक ही प्रजाति के जीवों का समूह। | एक जंगल में रहने वाले सभी हिरण। |
| समुदाय (Community) | एक क्षेत्र में रहने वाली विभिन्न प्रजातियों की जनसंख्याओं का समूह। | जंगल के पेड़, पक्षी, कीट, हिरण आदि। |
| पारितंत्र (Ecosystem) | समुदाय तथा उसके अजैविक पर्यावरण के बीच पारस्परिक क्रिया की इकाई। | तालाब, जंगल, घास का मैदान। |
| बायोम (Biome) | जलवायु एवं प्रमुख वनस्पति के आधार पर पहचाना जाने वाला विशाल पारिस्थितिक क्षेत्र। | रेगिस्तान, टुंड्रा, उष्णकटिबंधीय वर्षावन। |
| जीवमंडल (Biosphere) | पृथ्वी का वह क्षेत्र जहाँ जीवन पाया जाता है। | स्थल, जल और वायुमंडल के जीवन-समर्थक भाग। |
3. जीव एवं पर्यावरण के पारस्परिक संबंध
प्रत्येक जीव अपने पर्यावरण के साथ निरंतर संपर्क में रहता है। पर्यावरण में तापमान, प्रकाश, जल, मिट्टी, वायु, भोजन, प्रतिस्पर्धी जीव, शिकारी और परजीवी शामिल होते हैं। जीवों का वितरण, प्रजनन, वृद्धि और व्यवहार इन कारकों से प्रभावित होता है।
जीवों के बीच पारस्परिक संबंध
| संबंध | अर्थ | उदाहरण |
|---|---|---|
| पारस्परिकता (Mutualism) | दोनों जीवों को लाभ होता है। | लाइकेन में शैवाल और कवक का संबंध; परागण में पौधे एवं परागणकर्ता। |
| सहभोजिता (Commensalism) | एक जीव को लाभ, दूसरे को न लाभ न हानि। | पेड़ पर उगने वाले कुछ एपिफाइट पौधे। |
| परजीविता (Parasitism) | एक जीव लाभ प्राप्त करता है और दूसरे को हानि होती है। | मनुष्य में फीताकृमि, अमरबेल का पौधा। |
| परभक्षण (Predation) | एक जीव दूसरे जीव को भोजन के लिए मारता या खाता है। | शेर द्वारा हिरण का शिकार। |
| प्रतिस्पर्धा (Competition) | दो या अधिक जीव सीमित संसाधनों के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं। | पौधों में प्रकाश, जल और खनिजों के लिए प्रतिस्पर्धा। |
| अमेन्सलिज्म (Amensalism) | एक जीव को हानि होती है, दूसरे पर विशेष प्रभाव नहीं पड़ता। | कुछ कवकों द्वारा ऐसे पदार्थ बनाना जो बैक्टीरिया की वृद्धि रोकते हैं। |
पारस्परिक संबंधों के संकेत
- Mutualism = +/+
- Commensalism = +/0
- Parasitism = +/-
- Predation = +/-
- Competition = -/-
- Amensalism = -/0
4. जैविक एवं अजैविक घटक (Biotic and Abiotic Components)
पर्यावरण के घटकों को मुख्यतः दो वर्गों में बाँटा जाता है—जैविक घटक और अजैविक घटक। जीवित या कभी जीवित रहे जैविक पदार्थ तथा निर्जीव भौतिक-रासायनिक कारक मिलकर पारितंत्र की संरचना बनाते हैं।
जैविक घटक (Biotic Components)
पारितंत्र के सभी जीवित घटक जैविक घटक कहलाते हैं। इनमें पौधे, पशु, मनुष्य, जीवाणु, कवक, शैवाल और अन्य सूक्ष्मजीव शामिल हैं। कार्य के आधार पर इन्हें तीन प्रमुख समूहों में बाँटा जाता है।
- उत्पादक: हरे पौधे, शैवाल और कुछ जीवाणु जो प्रकाश संश्लेषण या रासायनिक संश्लेषण द्वारा कार्बनिक पदार्थ बनाते हैं।
- उपभोक्ता: वे जीव जो भोजन के लिए अन्य जीवों या उनके उत्पादों पर निर्भर रहते हैं।
- अपघटक: मुख्यतः जीवाणु और कवक, जो मृत जैव पदार्थों को सरल पदार्थों में विघटित करते हैं।
अजैविक घटक (Abiotic Components)
- प्रकाश – प्रकाश संश्लेषण और जीवों की जैविक गतिविधियों को प्रभावित करता है।
- तापमान – जीवों की वृद्धि, प्रजनन और वितरण को प्रभावित करता है।
- जल – सभी प्रमुख जैविक प्रक्रियाओं के लिए आवश्यक है।
- मिट्टी – पौधों को आधार, जल और खनिज प्रदान करती है।
- वायु – ऑक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन उपलब्ध कराती है।
- खनिज लवण – जीवों की वृद्धि और चयापचय के लिए आवश्यक हैं।
- pH एवं लवणता – विशेषकर जलीय जीवों के वितरण को प्रभावित करते हैं।
5. पारितंत्र (Ecosystem)
पारितंत्र प्रकृति की एक क्रियात्मक इकाई है, जिसमें किसी क्षेत्र के जीवित समुदाय और उसके अजैविक पर्यावरण के बीच परस्पर क्रिया होती है। इसमें ऊर्जा का प्रवाह और पदार्थों का चक्रण लगातार चलता रहता है। पारितंत्र में पौधे, पशु, सूक्ष्मजीव, मिट्टी, जल, वायु, प्रकाश और तापमान सभी एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं।
पारितंत्र शब्द का प्रयोग ब्रिटिश पारिस्थितिकीविद् ए. जी. टैंसले (A. G. Tansley) ने वर्ष 1935 में किया था। पारितंत्र छोटा भी हो सकता है, जैसे एक जल से भरा पात्र, और बहुत बड़ा भी, जैसे महासागर या वन।
पारितंत्र की प्रमुख विशेषताएँ
- जैविक एवं अजैविक घटकों की उपस्थिति।
- ऊर्जा का एक दिशा में प्रवाह।
- पोषक तत्त्वों का चक्रीय प्रवाह।
- खाद्य श्रृंखला और खाद्य जाल का निर्माण।
- उत्पादन, उपभोग और अपघटन की प्रक्रियाएँ।
- समय के साथ परिवर्तन एवं गतिशील संतुलन।
पारितंत्र के कार्यात्मक घटक
| कार्य | विवरण |
|---|---|
| उत्पादन (Productivity) | उत्पादकों द्वारा जैव पदार्थ या बायोमास का निर्माण। |
| अपघटन (Decomposition) | मृत जैव पदार्थों का सरल पदार्थों में टूटना। |
| ऊर्जा प्रवाह (Energy Flow) | ऊर्जा का उत्पादकों से उपभोक्ताओं और अपघटकों तक स्थानांतरण। |
| पोषक तत्त्वों का चक्रण | कार्बन, नाइट्रोजन, जल एवं अन्य तत्त्वों का पर्यावरण में पुनर्चक्रण। |
6. पारितंत्र के प्रकार – स्थलीय एवं जलीय
पारितंत्र को उसके भौगोलिक एवं भौतिक स्वरूप के आधार पर मुख्यतः स्थलीय और जलीय पारितंत्र में बाँटा जाता है। इसके अतिरिक्त प्राकृतिक और कृत्रिम पारितंत्र भी होते हैं।
स्थलीय पारितंत्र (Terrestrial Ecosystem)
- वन पारितंत्र: पेड़-पौधों की अधिकता वाला क्षेत्र, जहाँ अनेक प्रकार के जीव पाए जाते हैं।
- घासस्थल पारितंत्र: घास प्रमुख वनस्पति होती है; चरने वाले शाकाहारी जीव और उनके शिकारी पाए जाते हैं।
- मरुस्थलीय पारितंत्र: कम वर्षा, जल की कमी और तापमान में अधिक अंतर इसकी विशेषताएँ हैं।
- टुंड्रा पारितंत्र: अत्यधिक ठंडा क्षेत्र, जहाँ वनस्पति कम और वृक्षों की वृद्धि सीमित होती है।
- पर्वतीय पारितंत्र: ऊँचाई, तापमान और वर्षा के अनुसार वनस्पति एवं जीवों में परिवर्तन होता है।
जलीय पारितंत्र (Aquatic Ecosystem)
जल में पाए जाने वाले पारितंत्र जलीय पारितंत्र कहलाते हैं। इन्हें मुख्यतः मीठे जल और समुद्री पारितंत्र में बाँटा जाता है।
| प्रकार | विशेषताएँ | उदाहरण |
|---|---|---|
| तालाब (Pond) | छोटा स्थिर मीठे जल का पारितंत्र। | गाँव का तालाब। |
| झील (Lake) | बड़ा स्थिर जल निकाय। | डल झील, वुलर झील। |
| नदी (River) | बहता हुआ मीठा जल। | गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र। |
| आर्द्रभूमि (Wetland) | स्थायी या मौसमी रूप से जल से प्रभावित क्षेत्र। | दलदल, झील के किनारे की आर्द्रभूमि। |
| समुद्री पारितंत्र | लवणीय जल वाला विशाल पारितंत्र। | अरब सागर, बंगाल की खाड़ी। |
| मुहाना (Estuary) | जहाँ नदी का मीठा जल समुद्र के खारे जल से मिलता है। | नदी का समुद्र में मिलने वाला क्षेत्र। |
| प्रवाल भित्ति (Coral Reef) | प्रवाल जीवों द्वारा निर्मित अत्यधिक जैव विविधतापूर्ण समुद्री पारितंत्र। | लक्षद्वीप एवं अंडमान-निकोबार क्षेत्र। |
प्राकृतिक एवं कृत्रिम पारितंत्र
- प्राकृतिक पारितंत्र: प्राकृतिक रूप से विकसित होते हैं, जैसे जंगल, नदी, समुद्र और झील।
- कृत्रिम पारितंत्र: मानव द्वारा बनाए या नियंत्रित किए जाते हैं, जैसे खेत, बगीचा, मछलीघर और जलाशय।
7. उत्पादक, उपभोक्ता एवं अपघटक
उत्पादक (Producers)
उत्पादक वे जीव हैं जो अकार्बनिक पदार्थों से कार्बनिक भोजन का निर्माण करते हैं। अधिकांश पारितंत्रों में हरे पौधे और शैवाल सूर्य के प्रकाश की सहायता से प्रकाश संश्लेषण करते हैं। कुछ जीवाणु रासायनिक ऊर्जा का उपयोग करके रासायनिक संश्लेषण द्वारा भोजन बनाते हैं। उत्पादक पारितंत्र में ऊर्जा प्रवेश का प्रमुख मार्ग हैं।
उपभोक्ता (Consumers)
उपभोक्ता वे जीव हैं जो भोजन के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उत्पादकों पर निर्भर होते हैं। इन्हें पोषण के आधार पर विभिन्न स्तरों में बाँटा जाता है।
| प्रकार | आहार | उदाहरण |
|---|---|---|
| प्राथमिक उपभोक्ता | उत्पादकों को खाते हैं; सामान्यतः शाकाहारी। | हिरण, खरगोश, टिड्डा। |
| द्वितीयक उपभोक्ता | प्राथमिक उपभोक्ताओं को खाते हैं। | मेंढक, छोटी मांसाहारी मछली। |
| तृतीयक उपभोक्ता | द्वितीयक उपभोक्ताओं को खाते हैं। | साँप, बड़ी मांसाहारी मछली। |
| शीर्ष उपभोक्ता | खाद्य श्रृंखला के उच्चतम स्तर पर होते हैं। | बाघ, शेर, कुछ शिकारी पक्षी। |
अपघटक (Decomposers)
अपघटक मृत पौधों, पशुओं और जैविक अपशिष्टों को सरल अकार्बनिक पदार्थों में बदलते हैं। जीवाणु और कवक इसके प्रमुख उदाहरण हैं। अपघटकों के कारण पोषक तत्त्व पुनः मिट्टी, जल और पर्यावरण में उपलब्ध हो जाते हैं। इनके बिना पोषक तत्त्वों का पुनर्चक्रण बाधित हो जाएगा।
8. खाद्य श्रृंखला एवं खाद्य जाल (Food Chain and Food Web)
खाद्य श्रृंखला (Food Chain)
खाद्य श्रृंखला जीवों का ऐसा क्रम है जिसमें एक जीव दूसरे जीव को भोजन के रूप में ग्रहण करता है और ऊर्जा एक पोषण स्तर से अगले पोषण स्तर तक पहुँचती है। खाद्य श्रृंखला सामान्यतः उत्पादक से शुरू होती है।
खाद्य श्रृंखला के प्रमुख प्रकार
- चराई खाद्य श्रृंखला (Grazing Food Chain): यह हरे पौधों या उत्पादकों से शुरू होती है। उदाहरण – घास → टिड्डा → मेंढक → साँप → बाज।
- अपरद खाद्य श्रृंखला (Detritus Food Chain): यह मृत जैव पदार्थों या अपरद से शुरू होती है। उदाहरण – मृत पत्तियाँ → केंचुआ → पक्षी।
- परजीवी खाद्य श्रृंखला: इसमें बड़े जीवों से छोटे परजीवियों और अतिपरजीवियों की ओर ऊर्जा स्थानांतरित हो सकती है।
घास → टिड्डा → मेंढक → साँप → बाज
खाद्य जाल (Food Web)
किसी पारितंत्र में अनेक खाद्य श्रृंखलाएँ आपस में जुड़कर खाद्य जाल बनाती हैं। प्रकृति में अधिकांश जीव एक ही प्रकार का भोजन नहीं खाते, इसलिए अनेक खाद्य संबंध एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं। खाद्य जाल पारितंत्र को अधिक जटिल बनाता है और किसी एक खाद्य स्रोत की कमी होने पर कुछ जीवों को वैकल्पिक भोजन उपलब्ध करा सकता है।
9. पोषण स्तर एवं पारिस्थितिक पिरामिड
पोषण स्तर (Trophic Level)
खाद्य श्रृंखला में किसी जीव की भोजन प्राप्त करने की स्थिति को उसका पोषण स्तर कहते हैं। उत्पादक प्रथम पोषण स्तर पर, शाकाहारी प्राथमिक उपभोक्ता दूसरे पोषण स्तर पर तथा मांसाहारी क्रमशः उच्च पोषण स्तरों पर होते हैं।
| पोषण स्तर | जीव | उदाहरण |
|---|---|---|
| प्रथम | उत्पादक | घास, हरे पौधे। |
| द्वितीय | प्राथमिक उपभोक्ता | टिड्डा, हिरण। |
| तृतीय | द्वितीयक उपभोक्ता | मेंढक, छोटी मछली। |
| चतुर्थ | तृतीयक उपभोक्ता | साँप, बड़ी मछली। |
| पाँचवाँ | शीर्ष उपभोक्ता | बाज, शेर। |
पारिस्थितिक पिरामिड (Ecological Pyramids)
किसी पारितंत्र के विभिन्न पोषण स्तरों पर जीवों की संख्या, जैवभार या ऊर्जा की मात्रा को पिरामिड के रूप में प्रदर्शित करना पारिस्थितिक पिरामिड कहलाता है। इस अवधारणा को चार्ल्स एल्टन (Charles Elton) ने विकसित किया था।
पारिस्थितिक पिरामिड के प्रकार
- संख्या का पिरामिड (Pyramid of Numbers): प्रत्येक पोषण स्तर पर जीवों की संख्या दर्शाता है।
- जैवभार का पिरामिड (Pyramid of Biomass): प्रत्येक पोषण स्तर पर जीवों के कुल जैवभार को दर्शाता है।
- ऊर्जा का पिरामिड (Pyramid of Energy): प्रत्येक पोषण स्तर पर उपलब्ध ऊर्जा को दर्शाता है।
पिरामिड के आकार
| पिरामिड | सामान्य स्वरूप | विशेष तथ्य |
|---|---|---|
| संख्या का पिरामिड | सीधा या उल्टा दोनों हो सकता है। | वन में एक बड़े पेड़ पर अनेक कीट होने से उल्टा स्वरूप संभव है। |
| जैवभार का पिरामिड | स्थलीय पारितंत्र में प्रायः सीधा; कुछ जलीय पारितंत्रों में उल्टा। | जलीय पारितंत्र में फाइटोप्लैंकटन का तत्कालीन जैवभार कम हो सकता है। |
| ऊर्जा का पिरामिड | हमेशा सीधा। | प्रत्येक अगले पोषण स्तर पर ऊर्जा कम उपलब्ध होती है। |
10. ऊर्जा प्रवाह एवं 10 प्रतिशत नियम
पारितंत्र में ऊर्जा का प्रमुख स्रोत सूर्य है। हरे पौधे सूर्य के प्रकाश की ऊर्जा को प्रकाश संश्लेषण द्वारा रासायनिक ऊर्जा में बदलते हैं। यह ऊर्जा भोजन के माध्यम से शाकाहारियों और फिर मांसाहारियों तक पहुँचती है। प्रत्येक पोषण स्तर पर ऊर्जा का कुछ भाग श्वसन, गति, वृद्धि और अन्य जैविक क्रियाओं में खर्च होकर ऊष्मा के रूप में वातावरण में निकल जाता है।
ऊर्जा प्रवाह की विशेषताएँ
- ऊर्जा का प्रवाह एकदिशीय होता है।
- ऊर्जा सूर्य से उत्पादकों और फिर उपभोक्ताओं तक पहुँचती है।
- प्रत्येक पोषण स्तर पर ऊर्जा का कुछ भाग ऊष्मा के रूप में नष्ट हो जाता है।
- ऊर्जा का पुनर्चक्रण पदार्थों की तरह नहीं होता।
- ऊर्जा का प्रवाह खाद्य श्रृंखला और खाद्य जाल के माध्यम से होता है।
लिंडेमैन का 10 प्रतिशत नियम (Ten Percent Law)
पारिस्थितिकीविद् रेमंड लिंडेमैन (Raymond Lindeman) ने 1942 में ऊर्जा स्थानांतरण का 10 प्रतिशत नियम प्रस्तुत किया। इसके अनुसार एक पोषण स्तर पर उपलब्ध ऊर्जा का औसतन लगभग 10 प्रतिशत भाग ही अगले पोषण स्तर तक स्थानांतरित होता है। शेष ऊर्जा का बड़ा भाग जीवों की जैविक गतिविधियों में खर्च होता है या ऊष्मा के रूप में निकल जाता है।
उदाहरण
| पोषण स्तर | उपलब्ध ऊर्जा |
|---|---|
| उत्पादक | 10,000 kJ |
| प्राथमिक उपभोक्ता | 1,000 kJ |
| द्वितीयक उपभोक्ता | 100 kJ |
| तृतीयक उपभोक्ता | 10 kJ |
11. जैव-भू-रासायनिक चक्र (Biogeochemical Cycles)
प्रकृति में कार्बन, नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, जल, फॉस्फोरस और सल्फर जैसे तत्त्व जीवों तथा पर्यावरण के बीच लगातार चक्रित होते रहते हैं। इन चक्रों में जैविक, भौतिक और रासायनिक प्रक्रियाएँ शामिल होती हैं। इन्हें जैव-भू-रासायनिक चक्र कहा जाता है।
इन चक्रों के कारण आवश्यक पदार्थों की उपलब्धता बनी रहती है और पारितंत्र में पदार्थों का पुनर्चक्रण होता है। ऊर्जा का प्रवाह एकदिशीय होता है, जबकि पदार्थों का चक्रण होता है।
प्रमुख जैव-भू-रासायनिक चक्र
- जल चक्र (Water Cycle)
- कार्बन चक्र (Carbon Cycle)
- नाइट्रोजन चक्र (Nitrogen Cycle)
- ऑक्सीजन चक्र (Oxygen Cycle)
- फॉस्फोरस चक्र (Phosphorus Cycle)
- सल्फर चक्र (Sulphur Cycle)
12. कार्बन, नाइट्रोजन, ऑक्सीजन एवं जल चक्र
(A) कार्बन चक्र (Carbon Cycle)
कार्बन सभी प्रमुख कार्बनिक यौगिकों का आधार है। वायुमंडल में कार्बन मुख्यतः कार्बन डाइऑक्साइड के रूप में पाया जाता है। पौधे प्रकाश संश्लेषण के दौरान कार्बन डाइऑक्साइड का उपयोग करके कार्बनिक पदार्थ बनाते हैं। यह कार्बन खाद्य श्रृंखला के माध्यम से शाकाहारियों और मांसाहारियों तक पहुँचता है। श्वसन, अपघटन और दहन के दौरान कार्बन पुनः वातावरण में लौटता है।
कार्बन चक्र की प्रमुख प्रक्रियाएँ
- प्रकाश संश्लेषण द्वारा CO₂ का अवशोषण।
- भोजन के माध्यम से कार्बन का जीवों में स्थानांतरण।
- श्वसन द्वारा CO₂ का उत्सर्जन।
- मृत जीवों के अपघटन द्वारा कार्बन का मुक्त होना।
- जीवाश्म ईंधन के दहन से CO₂ का उत्सर्जन।
- महासागरों द्वारा CO₂ का अवशोषण और मुक्त होना।
(B) नाइट्रोजन चक्र (Nitrogen Cycle)
वायुमंडल में लगभग 78 प्रतिशत नाइट्रोजन गैस होती है। अधिकांश जीव वायुमंडलीय नाइट्रोजन का सीधे उपयोग नहीं कर सकते। नाइट्रोजन को उपयोगी रूपों में बदलने और फिर वातावरण में लौटाने की प्रक्रिया नाइट्रोजन चक्र कहलाती है।
नाइट्रोजन चक्र की प्रमुख अवस्थाएँ
- नाइट्रोजन स्थिरीकरण (Nitrogen Fixation): वायुमंडलीय नाइट्रोजन को अमोनिया या संबंधित उपयोगी यौगिकों में बदलना। Rhizobium जैसे जीवाणु दलहनी पौधों की जड़ों की ग्रंथियों में यह कार्य करते हैं। कुछ स्वतंत्र जीवाणु और सायनोबैक्टीरिया भी नाइट्रोजन स्थिरीकरण करते हैं।
- नाइट्रीकरण (Nitrification): अमोनिया/अमोनियम का पहले नाइट्राइट और फिर नाइट्रेट में ऑक्सीकरण।
- आत्मसात्करण (Assimilation): पौधों द्वारा नाइट्रेट या अमोनियम का अवशोषण करके प्रोटीन और अन्य कार्बनिक यौगिक बनाना।
- अमोनीकरण (Ammonification): मृत जीवों एवं अपशिष्टों के जैविक नाइट्रोजन का अमोनिया/अमोनियम में परिवर्तन।
- विनाइट्रीकरण (Denitrification): नाइट्रेट का गैसीय नाइट्रोजन या नाइट्रोजन ऑक्साइडों में परिवर्तन होकर वातावरण में लौटना।
(C) ऑक्सीजन चक्र (Oxygen Cycle)
ऑक्सीजन वायुमंडल, जलमंडल और जीवमंडल के बीच चक्रित होती है। हरे पौधे और शैवाल प्रकाश संश्लेषण के दौरान ऑक्सीजन मुक्त करते हैं। जीव श्वसन में ऑक्सीजन का उपयोग करते हैं। दहन और अपघटन की प्रक्रियाएँ भी ऑक्सीजन के चक्र को प्रभावित करती हैं।
(D) जल चक्र (Water Cycle)
जल चक्र वह प्राकृतिक प्रक्रिया है जिसमें जल पृथ्वी की सतह, महासागरों, नदियों, झीलों, मिट्टी, जीवों और वायुमंडल के बीच लगातार संचरित होता रहता है। सूर्य की ऊर्जा इस चक्र को चलाने में प्रमुख भूमिका निभाती है।
जल चक्र की प्रमुख अवस्थाएँ
- वाष्पीकरण (Evaporation): जल का तरल अवस्था से वाष्प में बदलना।
- वाष्पोत्सर्जन (Transpiration): पौधों से जलवाष्प का निकलना।
- संघनन (Condensation): जलवाष्प का ठंडा होकर छोटी जल-बूँदों में बदलना।
- वर्षण (Precipitation): वर्षा, हिमपात या ओलावृष्टि के रूप में जल का पृथ्वी पर गिरना।
- अवशोषण एवं अंतःस्रवण: जल का मिट्टी में प्रवेश करना।
- सतही अपवाह (Runoff): जल का भूमि की सतह पर बहकर नदी, झील और समुद्र तक पहुँचना।
चार प्रमुख चक्रों की तुलना
| चक्र | मुख्य स्रोत/भंडार | प्रमुख प्रक्रिया |
|---|---|---|
| कार्बन चक्र | वायुमंडल, महासागर, जीवाश्म ईंधन, जीव | प्रकाश संश्लेषण, श्वसन, अपघटन, दहन। |
| नाइट्रोजन चक्र | वायुमंडलीय N₂, मिट्टी, जीव | स्थिरीकरण, नाइट्रीकरण, अमोनीकरण, विनाइट्रीकरण। |
| ऑक्सीजन चक्र | वायुमंडल, जल एवं खनिज | प्रकाश संश्लेषण, श्वसन, दहन। |
| जल चक्र | महासागर, नदियाँ, झीलें, भूजल, हिम | वाष्पीकरण, संघनन, वर्षण, अपवाह। |
13. जैव विविधता – प्रकार एवं महत्त्व (Biodiversity)
जैव विविधता (Biodiversity) का अर्थ पृथ्वी पर पाए जाने वाले जीवों की विविधता और उनके बीच पाई जाने वाली आनुवंशिक, प्रजातीय एवं पारितंत्रीय भिन्नता से है। इसमें सूक्ष्मजीव, पौधे, पशु और उनके आवास शामिल हैं। जैव विविधता प्राकृतिक पारितंत्रों की स्थिरता, उत्पादकता और पारिस्थितिक सेवाओं के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
जैव विविधता के तीन प्रमुख स्तर
- आनुवंशिक विविधता (Genetic Diversity): एक ही प्रजाति के विभिन्न जीवों में जीन और आनुवंशिक लक्षणों की विविधता। उदाहरण – धान और गेहूँ की विभिन्न किस्में।
- प्रजातीय विविधता (Species Diversity): किसी क्षेत्र में विभिन्न प्रजातियों की विविधता और उनकी सापेक्ष प्रचुरता। उदाहरण – जंगल में पेड़, पक्षी, स्तनधारी, कीट आदि।
- पारितंत्रीय विविधता (Ecosystem Diversity): किसी क्षेत्र में विभिन्न पारितंत्रों की विविधता। उदाहरण – वन, घासस्थल, रेगिस्तान, आर्द्रभूमि और समुद्री क्षेत्र।
जैव विविधता का महत्त्व
- खाद्य पदार्थ, औषधियाँ, लकड़ी, रेशा और अन्य संसाधन उपलब्ध कराती है।
- परागण, बीज प्रसार और प्राकृतिक कीट नियंत्रण में सहायता करती है।
- मिट्टी की उर्वरता और पोषक तत्त्वों के चक्रण में योगदान देती है।
- जल शुद्धीकरण और जलवायु नियमन में सहायता करती है।
- प्राकृतिक आपदाओं के प्रभाव को कम करने में कुछ पारितंत्र महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
- आर्थिक, सांस्कृतिक, वैज्ञानिक और सौंदर्य संबंधी महत्त्व रखती है।
- भविष्य में खाद्य, औषधि और कृषि सुधार के लिए आनुवंशिक संसाधन उपलब्ध कराती है।
जैव विविधता के लिए प्रमुख खतरे
- आवास का विनाश और विखंडन।
- अत्यधिक शिकार एवं जैव संसाधनों का अति-दोहन।
- विदेशी आक्रामक प्रजातियाँ (Invasive Alien Species)।
- प्रदूषण।
- जलवायु परिवर्तन।
- वनों की कटाई और भूमि उपयोग में परिवर्तन।
- अवैध वन्यजीव व्यापार।
14. जैव विविधता के हॉटस्पॉट (Biodiversity Hotspots)
जैव विविधता हॉटस्पॉट ऐसे भौगोलिक क्षेत्र हैं जहाँ स्थानिक (Endemic) प्रजातियों की अधिकता होती है, लेकिन उनके प्राकृतिक आवास पर गंभीर खतरा भी मौजूद होता है। हॉटस्पॉट की अवधारणा वैज्ञानिक नॉर्मन मायर्स (Norman Myers) ने 1988 में प्रस्तुत की थी।
हॉटस्पॉट घोषित करने के प्रमुख मानदंड
- कम-से-कम 1,500 स्थानिक संवहनी पादप प्रजातियाँ होनी चाहिए।
- मूल प्राकृतिक वनस्पति का कम-से-कम 70 प्रतिशत नष्ट हो चुका होना चाहिए।
भारत से संबंधित चार वैश्विक हॉटस्पॉट
| हॉटस्पॉट | भारत में संबंधित क्षेत्र | विशेषता |
|---|---|---|
| हिमालय (Himalaya) | हिमालयी क्षेत्र | ऊँचाई के अनुसार बदलते पारितंत्र, स्थानिक वनस्पति एवं जीव। |
| इंडो-बर्मा (Indo-Burma) | पूर्वोत्तर भारत के बड़े भाग | उष्णकटिबंधीय वन, अनेक पौधे, पक्षी एवं उभयचर। |
| पश्चिमी घाट-श्रीलंका (Western Ghats-Sri Lanka) | पश्चिमी घाट | उच्च स्थानिकता, सदाबहार वन और विशिष्ट उभयचर। |
| सुंडालैंड (Sundaland) | भारत में निकोबार द्वीपसमूह | द्वीपीय एवं उष्णकटिबंधीय जैव विविधता। |
15. भारत की जैव विविधता एवं प्रमुख राष्ट्रीय उद्यान
भारत विश्व के जैव विविधता संपन्न देशों में शामिल है। यहाँ हिमालय, पश्चिमी घाट, थार मरुस्थल, सुंदरबन के मैंग्रोव, पूर्वोत्तर के वर्षावन, समुद्री पारितंत्र और द्वीपीय क्षेत्र जैसे अनेक प्रकार के प्राकृतिक आवास पाए जाते हैं। भौगोलिक स्थिति, जलवायु, स्थलाकृति और वर्षा की विविधता के कारण भारत में वनस्पतियों और जीवों की समृद्ध विविधता मिलती है।
भारत के प्रमुख जैव-भौगोलिक क्षेत्र
भारत को जैव-भौगोलिक आधार पर सामान्यतः दस प्रमुख क्षेत्रों में विभाजित किया जाता है।
- ट्रांस-हिमालय।
- हिमालय।
- भारतीय मरुस्थल।
- अर्ध-शुष्क क्षेत्र।
- पश्चिमी घाट।
- दक्कन प्रायद्वीप।
- गंगा का मैदान।
- पूर्वोत्तर भारत।
- द्वीप समूह।
- तटीय क्षेत्र।
भारत के प्रमुख राष्ट्रीय उद्यान
| राष्ट्रीय उद्यान | राज्य/केंद्रशासित प्रदेश | प्रमुख पहचान |
|---|---|---|
| जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान | उत्तराखंड | भारत का पहला राष्ट्रीय उद्यान; बाघ संरक्षण। |
| दुधवा राष्ट्रीय उद्यान | उत्तर प्रदेश | तराई क्षेत्र, बाघ, बारहसिंगा। |
| काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान | असम | एक सींग वाला भारतीय गैंडा। |
| मानस राष्ट्रीय उद्यान | असम | बाघ, हाथी एवं स्वर्ण लंगूर; UNESCO विश्व धरोहर क्षेत्र। |
| सुंदरबन राष्ट्रीय उद्यान | पश्चिम बंगाल | मैंग्रोव वन और रॉयल बंगाल टाइगर। |
| गिर राष्ट्रीय उद्यान | गुजरात | एशियाई सिंह। |
| रणथंभौर राष्ट्रीय उद्यान | राजस्थान | बाघ एवं शुष्क पर्णपाती वन। |
| केवलादेव घना राष्ट्रीय उद्यान | राजस्थान | पक्षियों के लिए प्रसिद्ध आर्द्रभूमि। |
| सरिस्का राष्ट्रीय उद्यान | राजस्थान | बाघ संरक्षण क्षेत्र। |
| कान्हा राष्ट्रीय उद्यान | मध्य प्रदेश | बारहसिंगा संरक्षण के लिए प्रसिद्ध। |
| बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान | मध्य प्रदेश | बाघों के लिए प्रसिद्ध। |
| पेंच राष्ट्रीय उद्यान | मध्य प्रदेश एवं महाराष्ट्र | वन्यजीव एवं बाघ आवास। |
| सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान | मध्य प्रदेश | सतपुड़ा पर्वतीय वन क्षेत्र। |
| हेमिस राष्ट्रीय उद्यान | लद्दाख | हिम तेंदुआ। |
| दाचीगाम राष्ट्रीय उद्यान | जम्मू-कश्मीर | हंगुल (कश्मीर स्टैग)। |
| ग्रेट हिमालयन राष्ट्रीय उद्यान | हिमाचल प्रदेश | हिमालयी जैव विविधता। |
| नामदफा राष्ट्रीय उद्यान | अरुणाचल प्रदेश | समृद्ध वन्यजीव विविधता। |
| केइबुल लामजाओ राष्ट्रीय उद्यान | मणिपुर | विश्व का प्रसिद्ध तैरता राष्ट्रीय उद्यान; संगाई हिरण। |
| एराविकुलम राष्ट्रीय उद्यान | केरल | नीलगिरि तहर। |
| साइलेंट वैली राष्ट्रीय उद्यान | केरल | उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन। |
| पेरियार राष्ट्रीय उद्यान | केरल | हाथी एवं बाघ। |
| बांदीपुर राष्ट्रीय उद्यान | कर्नाटक | बाघ एवं हाथी। |
| नागरहोल राष्ट्रीय उद्यान | कर्नाटक | बाघ एवं हाथी। |
| सिमिलिपाल राष्ट्रीय उद्यान | ओडिशा | बाघ एवं जैव विविधता। |
| भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान | ओडिशा | मैंग्रोव और खारे पानी का मगरमच्छ। |
| महात्मा गांधी समुद्री राष्ट्रीय उद्यान | अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह | प्रवाल भित्तियाँ एवं समुद्री जैव विविधता। |
उत्तर प्रदेश के प्रमुख संरक्षित क्षेत्र
- दुधवा राष्ट्रीय उद्यान – लखीमपुर खीरी।
- पीलीभीत टाइगर रिजर्व – पीलीभीत क्षेत्र।
- कतर्नियाघाट वन्यजीव अभयारण्य – बहराइच।
- किशनपुर वन्यजीव अभयारण्य – लखीमपुर खीरी।
- राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य – उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान के चंबल क्षेत्र से संबंधित।
- रानीपुर टाइगर रिजर्व – चित्रकूट क्षेत्र।
भारत के प्रमुख जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र (Biosphere Reserves)
जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र ऐसे बड़े भौगोलिक क्षेत्र हैं जहाँ जैव विविधता संरक्षण के साथ स्थानीय समुदायों के सतत विकास और अनुसंधान को भी महत्त्व दिया जाता है। इनमें सामान्यतः कोर, बफर और संक्रमण क्षेत्र की व्यवस्था होती है।
| जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र | राज्य/क्षेत्र | प्रमुख विशेषता |
|---|---|---|
| नीलगिरि | तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक | भारत का पहला जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र, 1986। |
| नंदा देवी | उत्तराखंड | हिमालयी पारितंत्र। |
| नोकरेक | मेघालय | पूर्वोत्तर भारत की जैव विविधता। |
| मन्नार की खाड़ी | तमिलनाडु | समुद्री जैव विविधता एवं प्रवाल भित्तियाँ। |
| सुंदरबन | पश्चिम बंगाल | मैंग्रोव पारितंत्र। |
| मन्नार की खाड़ी | तमिलनाडु | समुद्री पारितंत्र और द्वीप। |
| सिमिलिपाल | ओडिशा | वन एवं बाघ आवास। |
| डिब्रू-सैखोवा | असम | नदीय एवं आर्द्रभूमि पारितंत्र। |
| पचमढ़ी | मध्य प्रदेश | सतपुड़ा का वन क्षेत्र। |
| अचानकमार-अमरकंटक | मध्य प्रदेश एवं छत्तीसगढ़ | वन एवं नदी उद्गम क्षेत्र। |
| कच्छ | गुजरात | मरुस्थलीय एवं तटीय पारितंत्र। |
| कोल्ड डेजर्ट | हिमाचल प्रदेश | शीत मरुस्थलीय पारितंत्र। |
| शेषाचलम पहाड़ियाँ | आंध्र प्रदेश | पूर्वी घाट की जैव विविधता। |
| अगस्त्यमलाई | केरल एवं तमिलनाडु | पश्चिमी घाट का जैव विविधता क्षेत्र। |
| कंचनजंगा | सिक्किम | हिमालयी उच्च पर्वतीय पारितंत्र। |
| पन्ना | मध्य प्रदेश | केन नदी एवं बाघ आवास। |
| ग्रेट निकोबार | अंडमान एवं निकोबार | द्वीपीय उष्णकटिबंधीय वन। |
| कोल्ड डेजर्ट | हिमाचल प्रदेश | ऊँचाई वाले शीत मरुस्थलीय आवास। |
16. संकटग्रस्त एवं विलुप्त प्रजातियाँ (Threatened and Extinct Species)
प्राकृतिक आवास का विनाश, अवैध शिकार, प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और अत्यधिक दोहन के कारण अनेक प्रजातियों की संख्या घट रही है। जिन प्रजातियों के विलुप्त होने का जोखिम अधिक होता है, उन्हें संकटग्रस्त प्रजातियाँ कहा जाता है।
प्रजातियों की प्रमुख संरक्षण स्थिति
- सामान्य (Common): जिनकी आबादी अपेक्षाकृत स्थिर और पर्याप्त है।
- दुर्लभ (Rare): जिनकी संख्या कम है या जिनका वितरण सीमित है।
- स्थानिक (Endemic): जो प्राकृतिक रूप से किसी विशेष भौगोलिक क्षेत्र तक सीमित हैं।
- संकटग्रस्त (Threatened): जिनके विलुप्त होने का जोखिम अधिक है।
- विलुप्त (Extinct): जिनका कोई जीवित सदस्य शेष नहीं है।
भारत की कुछ प्रमुख संकटग्रस्त प्रजातियाँ
| प्रजाति | प्रमुख आवास/क्षेत्र | संरक्षण संबंधी तथ्य |
|---|---|---|
| बंगाल टाइगर | भारत के विभिन्न वन एवं संरक्षित क्षेत्र | बाघ संरक्षण के लिए Project Tiger महत्त्वपूर्ण। |
| एशियाई सिंह | गिर एवं आसपास का गुजरात क्षेत्र | भारत में प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला प्रमुख क्षेत्र। |
| हिम तेंदुआ | हिमालयी उच्च पर्वतीय क्षेत्र | ऊँचाई वाले ठंडे पर्वतीय आवास का प्रमुख शिकारी। |
| घड़ियाल | नदीय पारितंत्र | नदी आवास और जल गुणवत्ता पर निर्भर। |
| ग्रेट इंडियन बस्टर्ड | मुख्यतः राजस्थान एवं गुजरात के शुष्क घासस्थल | घासस्थल संरक्षण की प्रमुख प्रजाति। |
| गंगा नदी डॉल्फिन | गंगा-ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र | स्वच्छ एवं उपयुक्त नदी पारितंत्र का संकेतक। |
| लाल पांडा | पूर्वी हिमालय | वनों और पर्वतीय आवास पर निर्भर। |
| संगाई हिरण | केइबुल लामजाओ, मणिपुर | तैरते हुए फुमदी आवास से जुड़ा। |
| हंगुल | कश्मीर क्षेत्र | दाचीगाम राष्ट्रीय उद्यान से संबंधित। |
| नीलगिरि तहर | पश्चिमी घाट | पर्वतीय घासस्थल एवं चट्टानी ढलान। |
विलुप्त प्रजातियों के उदाहरण
- डोडो – मॉरीशस का उड़ानहीन पक्षी।
- पैसेंजर पिजन – उत्तरी अमेरिका का पक्षी।
- थाइलेसिन – तस्मानियाई बाघ के नाम से प्रसिद्ध मार्सुपियल।
- ग्रेट ऑक – उत्तरी अटलांटिक क्षेत्र का उड़ानहीन पक्षी।
17. IUCN रेड लिस्ट एवं संरक्षण की श्रेणियाँ
IUCN का पूरा नाम International Union for Conservation of Nature है। यह प्रकृति संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों के सतत उपयोग से संबंधित एक अंतरराष्ट्रीय संस्था है। IUCN की Red List of Threatened Species विश्व स्तर पर प्रजातियों की संरक्षण स्थिति और विलुप्त होने के जोखिम का आकलन करने का महत्त्वपूर्ण माध्यम है।
IUCN की नौ प्रमुख श्रेणियाँ
| संकेत | श्रेणी | अर्थ |
|---|---|---|
| EX | Extinct | विलुप्त – कोई जीवित सदस्य शेष नहीं। |
| EW | Extinct in the Wild | प्राकृतिक आवास में विलुप्त; केवल नियंत्रित या कृत्रिम परिस्थितियों में जीवित। |
| CR | Critically Endangered | अति संकटग्रस्त – विलुप्त होने का अत्यंत उच्च जोखिम। |
| EN | Endangered | संकटग्रस्त – विलुप्त होने का बहुत उच्च जोखिम। |
| VU | Vulnerable | असुरक्षित – विलुप्त होने का उच्च जोखिम। |
| NT | Near Threatened | निकट संकटग्रस्त – वर्तमान में संकटग्रस्त नहीं, लेकिन निकट भविष्य में जोखिम हो सकता है। |
| LC | Least Concern | कम चिंताजनक – मूल्यांकन के अनुसार अपेक्षाकृत कम जोखिम। |
| DD | Data Deficient | आँकड़ों की कमी – जोखिम का आकलन करने के लिए पर्याप्त जानकारी उपलब्ध नहीं। |
| NE | Not Evaluated | अभी मूल्यांकन नहीं किया गया। |
CR + EN + VU = संकटग्रस्त प्रजातियाँ (Threatened Species)
परीक्षा में महत्त्वपूर्ण तथ्य
- IUCN रेड लिस्ट में कुल नौ श्रेणियाँ हैं।
- CR, EN और VU को संकटग्रस्त श्रेणियाँ माना जाता है।
- DD का अर्थ Data Deficient है, इसका अर्थ विलुप्त नहीं है।
- NE का अर्थ Not Evaluated है।
- EW का अर्थ Extinct in the Wild है।
- EX का अर्थ Extinct है।
18. वन्यजीव संरक्षण एवं जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र
वन्यजीव संरक्षण का उद्देश्य प्राकृतिक आवासों, वनस्पतियों, पशुओं और पारिस्थितिक प्रक्रियाओं को सुरक्षित रखना है। संरक्षण के माध्यम से प्रजातियों के विलुप्त होने का जोखिम कम किया जाता है और पारितंत्र की स्थिरता बनाए रखने में सहायता मिलती है।
संरक्षण की प्रमुख विधियाँ
1. प्राकृतिक आवास में संरक्षण (In-situ Conservation): इसमें जीवों को उनके प्राकृतिक आवास में संरक्षित किया जाता है।
- राष्ट्रीय उद्यान (National Parks)।
- वन्यजीव अभयारण्य (Wildlife Sanctuaries)।
- जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र (Biosphere Reserves)।
- संरक्षण रिजर्व (Conservation Reserves)।
- सामुदायिक रिजर्व (Community Reserves)।
2. प्राकृतिक आवास से बाहर संरक्षण (Ex-situ Conservation): इसमें जीवों या उनके आनुवंशिक पदार्थों का संरक्षण प्राकृतिक आवास से बाहर किया जाता है।
- चिड़ियाघर (Zoo)।
- वनस्पति उद्यान (Botanical Garden)।
- बीज बैंक (Seed Bank)।
- जीन बैंक (Gene Bank)।
- ऊतक संवर्धन (Tissue Culture)।
- शुक्राणु, अंडाणु और भ्रूण बैंक।
संरक्षित क्षेत्रों का अंतर
| संरक्षित क्षेत्र | मुख्य उद्देश्य | विशेषता |
|---|---|---|
| राष्ट्रीय उद्यान | वन्यजीव एवं पूरे पारितंत्र का संरक्षण। | कानूनी सुरक्षा अधिक कठोर; गतिविधियाँ नियमन के अधीन। |
| वन्यजीव अभयारण्य | विशेष वन्यजीवों और उनके आवास का संरक्षण। | कुछ गतिविधियाँ कानून एवं अनुमति के अधीन संभव हो सकती हैं। |
| जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र | जैव विविधता संरक्षण, अनुसंधान और सतत विकास। | कोर, बफर और संक्रमण क्षेत्र की अवधारणा। |
| संरक्षण रिजर्व | सरकारी भूमि पर वन्यजीव एवं आवास संरक्षण। | आमतौर पर संरक्षित क्षेत्रों के बीच संपर्क बनाए रखने में सहायक। |
| सामुदायिक रिजर्व | समुदाय या निजी भूमि पर संरक्षण को प्रोत्साहन। | स्थानीय समुदाय की भागीदारी महत्त्वपूर्ण। |
जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र के तीन भाग
- कोर क्षेत्र (Core Zone): सबसे अधिक संरक्षण वाला क्षेत्र, जहाँ प्राकृतिक पारितंत्र और जैव विविधता को सुरक्षित रखा जाता है।
- बफर क्षेत्र (Buffer Zone): कोर क्षेत्र के चारों ओर स्थित क्षेत्र, जहाँ अनुसंधान, शिक्षा और नियंत्रित गतिविधियाँ हो सकती हैं।
- संक्रमण क्षेत्र (Transition Zone): बाहरी क्षेत्र जहाँ स्थानीय समुदायों की भागीदारी के साथ सतत आर्थिक एवं सामाजिक गतिविधियाँ की जाती हैं।
भारत के प्रमुख वन्यजीव संरक्षण कार्यक्रम
| कार्यक्रम | वर्ष/आरंभ | उद्देश्य |
|---|---|---|
| Project Tiger | 1973 | बाघों एवं उनके प्राकृतिक आवासों का संरक्षण। |
| Project Elephant | 1992 | हाथियों, उनके आवास और गलियारों का संरक्षण। |
| Crocodile Conservation Project | 1975 | मगरमच्छों की प्रजातियों का संरक्षण एवं प्रजनन। |
| Project Snow Leopard | 2009 | हिमालयी उच्च पर्वतीय क्षेत्र में हिम तेंदुए और उसके आवास का संरक्षण। |
| Project Dolphin | 2020 | नदीय एवं समुद्री डॉल्फिन संरक्षण को बढ़ावा देना। |
वन्यजीव संरक्षण से संबंधित प्रमुख कानून
- वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 – वन्यजीवों, पौधों और संरक्षित क्षेत्रों के संरक्षण का प्रमुख कानून।
- वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 – वन भूमि के गैर-वन उपयोग के नियमन से संबंधित; 2023 में संशोधन हुआ।
- पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 – पर्यावरण संरक्षण के लिए व्यापक कानूनी ढाँचा।
- जैव विविधता अधिनियम, 2002 – जैव विविधता संरक्षण, सतत उपयोग और लाभों के न्यायसंगत बँटवारे से संबंधित।
19. पारिस्थितिक अनुक्रमण एवं पारिस्थितिक संतुलन
पारिस्थितिक अनुक्रमण (Ecological Succession)
किसी क्षेत्र में समय के साथ जीव समुदायों की संरचना में होने वाले क्रमिक और दिशात्मक परिवर्तन को पारिस्थितिक अनुक्रमण कहते हैं। इसमें एक समुदाय के स्थान पर दूसरा समुदाय स्थापित होता है और लंबे समय में अपेक्षाकृत स्थिर समुदाय विकसित हो सकता है।
अनुक्रमण के प्रकार
- प्राथमिक अनुक्रमण (Primary Succession): ऐसे स्थान पर शुरू होता है जहाँ पहले मिट्टी और विकसित समुदाय नहीं होता, जैसे नई ज्वालामुखीय चट्टान या नंगी चट्टान।
- द्वितीयक अनुक्रमण (Secondary Succession): ऐसे क्षेत्र में होता है जहाँ पहले समुदाय मौजूद था, लेकिन आग, बाढ़ या अन्य कारणों से नष्ट हो गया और मिट्टी बनी रहती है।
प्राथमिक अनुक्रमण की अवस्थाएँ
- न्यूडेशन: नया खाली या अनावृत क्षेत्र बनना।
- आक्रमण: जीवों या बीजों का उस क्षेत्र में पहुँचना।
- स्थापन: नए जीवों का अंकुरण, वृद्धि और प्रजनन।
- प्रतिस्पर्धा एवं सहक्रिया: विभिन्न प्रजातियों के बीच संसाधनों के लिए प्रतिस्पर्धा।
- प्रतिक्रिया: समुदाय द्वारा पर्यावरण में परिवर्तन।
- स्थिरीकरण: अपेक्षाकृत स्थिर समुदाय का विकास।
अनुक्रमण के उदाहरण
- लिथोसियर: नंगी चट्टानों पर प्राथमिक अनुक्रमण।
- हाइड्रोसियर: जल निकाय से शुरू होने वाला अनुक्रमण।
- जीरोसियर: अत्यंत शुष्क स्थान से शुरू होने वाला अनुक्रमण।
पारिस्थितिक संतुलन (Ecological Balance)
पारिस्थितिक संतुलन वह गतिशील स्थिति है जिसमें किसी पारितंत्र के जीवों, संसाधनों और पर्यावरणीय प्रक्रियाओं के बीच ऐसा संबंध बना रहता है जिससे पारितंत्र की संरचना और कार्य लंबे समय तक कायम रह सकें। यह स्थिर या अपरिवर्तनीय स्थिति नहीं है, बल्कि प्राकृतिक उतार-चढ़ाव के साथ बनी रहने वाली गतिशील अवस्था है।
पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ने के कारण
- वनों की कटाई।
- प्रदूषण और प्राकृतिक संसाधनों का अति-दोहन।
- आक्रामक विदेशी प्रजातियों का प्रवेश।
- जलवायु परिवर्तन।
- अत्यधिक शिकार और अवैध वन्यजीव व्यापार।
- आवासों का विखंडन और भूमि उपयोग में परिवर्तन।
20. पर्यावरणीय प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, ग्रीनहाउस प्रभाव, ओजोन क्षरण एवं संरक्षण
पर्यावरणीय प्रदूषण (Environmental Pollution)
जब वायु, जल, मिट्टी या अन्य पर्यावरणीय घटकों में हानिकारक पदार्थों या ऊर्जा की मात्रा इतनी बढ़ जाती है कि जीवों, पारितंत्र या मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, तो इसे प्रदूषण कहते हैं। प्रदूषण प्राकृतिक स्रोतों से भी हो सकता है, लेकिन आधुनिक समय में मानव गतिविधियाँ इसका प्रमुख कारण हैं।
(A) वायु प्रदूषण (Air Pollution)
वायु में हानिकारक गैसों, धूलकणों, धुएँ और सूक्ष्म कणों की मात्रा बढ़ने से वायु प्रदूषण होता है। इसका प्रमुख स्रोत वाहन, उद्योग, जीवाश्म ईंधन का दहन, निर्माण कार्य, कचरा जलाना और कुछ प्राकृतिक घटनाएँ हैं।
| प्रदूषक | मुख्य स्रोत | प्रभाव |
|---|---|---|
| कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) | अपूर्ण दहन, वाहन | हीमोग्लोबिन से जुड़कर ऑक्सीजन परिवहन में बाधा। |
| सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) | कोयला एवं सल्फर युक्त ईंधन का दहन | श्वसन संबंधी समस्याएँ और अम्लीय वर्षा में योगदान। |
| नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx) | वाहन एवं औद्योगिक दहन | स्मॉग और अम्लीय वर्षा में योगदान। |
| कण पदार्थ (PM10, PM2.5) | धूल, धुआँ, वाहन, उद्योग | फेफड़ों एवं हृदय पर प्रतिकूल प्रभाव। |
| भूमि-स्तरीय ओजोन (O₃) | NOx और VOCs की सूर्य के प्रकाश में प्रतिक्रिया | श्वसन तंत्र को प्रभावित करता है। |
| सीसा (Lead) | कुछ औद्योगिक स्रोत, बैटरी एवं प्रदूषित धूल | तंत्रिका तंत्र, विशेषकर बच्चों के विकास पर प्रभाव। |
स्मॉग (Smog)
स्मॉग शब्द Smoke और Fog से मिलकर बना है। यह धुएँ, धुंध और विभिन्न वायु प्रदूषकों के मिश्रण से बनता है।
- क्लासिकल स्मॉग: धुआँ, कोहरा और सल्फर युक्त प्रदूषकों से संबंधित।
- फोटोकेमिकल स्मॉग: सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में नाइट्रोजन ऑक्साइड और वाष्पशील कार्बनिक यौगिकों की प्रतिक्रियाओं से बनता है। इसमें भूमि-स्तरीय ओजोन महत्त्वपूर्ण घटक है।
(B) जल प्रदूषण (Water Pollution)
जब जल में हानिकारक रसायन, रोगजनक, जैविक अपशिष्ट, भारी धातुएँ या अत्यधिक पोषक तत्त्व मिल जाते हैं और जल की गुणवत्ता प्रभावित होती है, तो इसे जल प्रदूषण कहते हैं।
जल प्रदूषण के प्रमुख कारण
- घरेलू सीवेज का जल स्रोतों में मिलना।
- औद्योगिक अपशिष्ट एवं रसायनों का जल में प्रवाह।
- कृषि में प्रयुक्त उर्वरक एवं कीटनाशकों का बहकर जल में पहुँचना।
- तेल रिसाव और प्लास्टिक कचरा।
- धार्मिक एवं अन्य ठोस अपशिष्टों का जल में निस्तारण।
यूट्रोफिकेशन (Eutrophication)
जब जल निकायों में नाइट्रोजन और फॉस्फोरस जैसे पोषक तत्त्व अत्यधिक मात्रा में पहुँच जाते हैं, तो शैवाल और जलीय पौधों की अत्यधिक वृद्धि हो सकती है। इस प्रक्रिया को यूट्रोफिकेशन कहते हैं। शैवाल के मरने और अपघटन के दौरान घुलित ऑक्सीजन कम हो सकती है, जिससे मछलियों और अन्य जलीय जीवों की मृत्यु हो सकती है।
जैव आवर्धन (Biomagnification)
खाद्य श्रृंखला के उच्च पोषण स्तरों पर कुछ स्थायी और वसा में घुलनशील प्रदूषकों की सांद्रता बढ़ती जाती है। इस प्रक्रिया को जैव आवर्धन कहते हैं। DDT और मिथाइल मरकरी इसके पारंपरिक उदाहरण हैं।
जैव संचयन (Bioaccumulation)
किसी जीव के शरीर में किसी रसायन या प्रदूषक का समय के साथ जमा होना जैव संचयन कहलाता है। जैव आवर्धन में खाद्य श्रृंखला के ऊँचे पोषण स्तरों पर प्रदूषक की सांद्रता बढ़ती है, जबकि जैव संचयन किसी एक जीव के शरीर में पदार्थ के जमा होने को दर्शाता है।
(C) मृदा प्रदूषण (Soil Pollution)
मिट्टी में हानिकारक रसायनों, भारी धातुओं, प्लास्टिक, कीटनाशकों और औद्योगिक अपशिष्टों के जमा होने से मृदा प्रदूषण होता है। इससे मिट्टी की उर्वरता, सूक्ष्मजीवों की विविधता, फसल की गुणवत्ता और खाद्य सुरक्षा प्रभावित हो सकती है।
(D) ध्वनि प्रदूषण (Noise Pollution)
अनावश्यक और अत्यधिक तीव्र ध्वनि से उत्पन्न प्रतिकूल प्रभाव ध्वनि प्रदूषण कहलाते हैं। वाहन, उद्योग, निर्माण कार्य, लाउडस्पीकर और हवाई जहाज इसके प्रमुख स्रोत हैं। इससे सुनने की क्षमता, नींद, मानसिक स्वास्थ्य और हृदय संबंधी स्वास्थ्य प्रभावित हो सकता है। ध्वनि की तीव्रता डेसीबल (dB) में मापी जाती है।
(E) तापीय प्रदूषण (Thermal Pollution)
जब उद्योगों या बिजलीघरों से निकला गर्म जल नदियों या झीलों में छोड़ा जाता है, तो जल का तापमान बढ़ सकता है। इससे जल में घुलित ऑक्सीजन की मात्रा कम हो सकती है और जलीय जीव प्रभावित हो सकते हैं।
(F) रेडियोधर्मी प्रदूषण (Radioactive Pollution)
रेडियोधर्मी पदार्थों के अनियंत्रित उत्सर्जन या अनुचित निस्तारण से पर्यावरण में आयनकारी विकिरण का स्तर बढ़ सकता है। परमाणु दुर्घटनाएँ, रेडियोधर्मी अपशिष्ट और कुछ औद्योगिक गतिविधियाँ इसके स्रोत हो सकते हैं। इससे कोशिकाओं, DNA और स्वास्थ्य पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ सकते हैं।
प्रमुख प्रदूषण नियंत्रण उपाय
- स्वच्छ ईंधन और स्वच्छ ऊर्जा का उपयोग।
- वाहनों और उद्योगों से निकलने वाले उत्सर्जन का नियंत्रण।
- घरेलू सीवेज एवं औद्योगिक अपशिष्ट का उपचार।
- कचरे का पृथक्करण, पुनर्चक्रण और वैज्ञानिक निस्तारण।
- रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों का संतुलित उपयोग।
- वृक्षारोपण और प्राकृतिक आवासों का संरक्षण।
- जल स्रोतों में कचरा एवं प्लास्टिक डालने पर रोक।
- पर्यावरणीय नियमों और मानकों का पालन।
जलवायु परिवर्तन (Climate Change)
जलवायु परिवर्तन का अर्थ पृथ्वी की जलवायु के औसत स्वरूप और उसमें होने वाले दीर्घकालिक परिवर्तनों से है। इसमें तापमान, वर्षा, हवाओं, समुद्र स्तर और चरम मौसमी घटनाओं के स्वरूप में परिवर्तन शामिल हो सकते हैं। वर्तमान समय में मानव गतिविधियों से उत्सर्जित ग्रीनहाउस गैसें जलवायु परिवर्तन का प्रमुख कारण हैं।
जलवायु परिवर्तन के प्रमुख कारण
- कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस का दहन।
- वनों की कटाई और भूमि उपयोग में परिवर्तन।
- औद्योगिक गतिविधियाँ।
- कृषि एवं पशुपालन से मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड का उत्सर्जन।
- सीमेंट निर्माण और अन्य औद्योगिक प्रक्रियाएँ।
जलवायु परिवर्तन के प्रमुख प्रभाव
- औसत वैश्विक तापमान में वृद्धि।
- हिमनदों और ध्रुवीय बर्फ का पिघलना।
- समुद्र के औसत स्तर में वृद्धि।
- लू, सूखा और कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा की घटनाओं के जोखिम में परिवर्तन।
- कृषि उत्पादन और खाद्य सुरक्षा पर प्रभाव।
- जैव विविधता और प्रजातियों के आवासों पर दबाव।
- महासागरों का गर्म होना और अम्लीकरण।
ग्रीनहाउस प्रभाव (Greenhouse Effect)
पृथ्वी की सतह सूर्य से ऊर्जा प्राप्त करती है और इस ऊर्जा का एक भाग अवरक्त विकिरण के रूप में वापस अंतरिक्ष की ओर भेजती है। वायुमंडल में मौजूद कुछ गैसें इस अवरक्त विकिरण को अवशोषित करके पुनः उत्सर्जित करती हैं। इससे पृथ्वी का निचला वायुमंडल और सतह गर्म रहते हैं। इस प्राकृतिक प्रक्रिया को ग्रीनहाउस प्रभाव कहते हैं। मानव गतिविधियों से ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा बढ़ने पर प्राकृतिक ग्रीनहाउस प्रभाव तीव्र हो जाता है और वैश्विक तापवृद्धि होती है।
प्रमुख ग्रीनहाउस गैसें
| गैस | प्रमुख स्रोत |
|---|---|
| कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) | जीवाश्म ईंधन का दहन, वनों की कटाई, सीमेंट निर्माण। |
| मीथेन (CH₄) | पशुपालन, धान के खेत, लैंडफिल, जीवाश्म ईंधन उत्पादन। |
| नाइट्रस ऑक्साइड (N₂O) | कृषि मिट्टी, उर्वरक, कुछ औद्योगिक प्रक्रियाएँ। |
| जलवाष्प | प्राकृतिक जल चक्र; यह एक महत्त्वपूर्ण प्राकृतिक ग्रीनहाउस गैस है। |
| ओजोन (O₃) | वायुमंडल में स्थान के अनुसार; क्षोभमंडलीय ओजोन ग्रीनहाउस गैस और प्रदूषक है। |
| फ्लोरीनयुक्त गैसें | कुछ औद्योगिक, शीतलन और इलेक्ट्रॉनिक प्रक्रियाएँ। |
ओजोन परत एवं ओजोन क्षरण (Ozone Depletion)
ओजोन (O₃) ऑक्सीजन का एक रूप है। समतापमंडल (Stratosphere) में लगभग 20 से 30 किलोमीटर की ऊँचाई के आसपास ओजोन की अधिक सांद्रता वाला क्षेत्र पाया जाता है। इसे ओजोन परत कहते हैं। यह सूर्य से आने वाली हानिकारक पराबैंगनी किरणों, विशेषकर UV-B, के बड़े भाग को अवशोषित करके पृथ्वी पर जीवन की रक्षा करती है।
ओजोन परत का क्षरण मुख्यतः क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs), हैलोन और कुछ अन्य ओजोन क्षयकारी पदार्थों से निकलने वाले क्लोरीन और ब्रोमीन के सक्रिय रूपों के कारण होता है। ये पदार्थ समतापमंडल में पहुँचकर ओजोन अणुओं को तोड़ने वाली रासायनिक प्रतिक्रियाओं में भाग लेते हैं।
ओजोन क्षरण के प्रमुख प्रभाव
- त्वचा कैंसर का जोखिम बढ़ना।
- आँखों में मोतियाबिंद का जोखिम बढ़ना।
- प्रतिरक्षा तंत्र पर प्रतिकूल प्रभाव।
- फसलों और समुद्री फाइटोप्लैंकटन पर प्रभाव।
- पारिस्थितिक तंत्रों पर प्रतिकूल प्रभाव।
ओजोन संरक्षण के लिए अंतरराष्ट्रीय समझौते
| समझौता | वर्ष | मुख्य उद्देश्य |
|---|---|---|
| वियना कन्वेंशन | 1985 | ओजोन परत के संरक्षण हेतु अंतरराष्ट्रीय सहयोग और वैज्ञानिक जानकारी का आदान-प्रदान। |
| मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल | 1987 | ओजोन क्षयकारी पदार्थों के उत्पादन और उपभोग को चरणबद्ध तरीके से कम एवं समाप्त करना। |
| किगाली संशोधन | 2016 | HFCs के उत्पादन एवं उपयोग में चरणबद्ध कमी; HFCs शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैसें हैं, लेकिन सामान्यतः ओजोन क्षयकारी पदार्थ नहीं। |
पर्यावरण संरक्षण के प्रमुख अंतरराष्ट्रीय समझौते
| समझौता/सम्मेलन | वर्ष | मुख्य विषय |
|---|---|---|
| रामसर कन्वेंशन | 1971 | अंतरराष्ट्रीय महत्त्व की आर्द्रभूमियों का संरक्षण। |
| स्टॉकहोम सम्मेलन | 1972 | मानव पर्यावरण पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन। |
| CITES | 1973 | लुप्तप्राय वन्यजीवों एवं वनस्पतियों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार का नियमन। |
| बॉन कन्वेंशन (CMS) | 1979 | प्रवासी वन्यजीव प्रजातियों का संरक्षण। |
| वियना कन्वेंशन | 1985 | ओजोन परत का संरक्षण। |
| मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल | 1987 | ओजोन क्षयकारी पदार्थों का नियंत्रण। |
| रियो पृथ्वी सम्मेलन | 1992 | पर्यावरण एवं सतत विकास। |
| जैव विविधता कन्वेंशन (CBD) | 1992 | जैव विविधता संरक्षण, सतत उपयोग और लाभों का न्यायसंगत बँटवारा। |
| UNFCCC | 1992 | जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए वैश्विक ढाँचा। |
| क्योटो प्रोटोकॉल | 1997 | औद्योगिक देशों के ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कटौती के लक्ष्य। |
| पेरिस समझौता | 2015 | वैश्विक तापवृद्धि को सीमित करने के लिए जलवायु कार्रवाई। |
भारत के प्रमुख पर्यावरणीय दिवस
| दिवस | तिथि |
|---|---|
| विश्व आर्द्रभूमि दिवस | 2 फरवरी |
| विश्व वन्यजीव दिवस | 3 मार्च |
| विश्व जल दिवस | 22 मार्च |
| पृथ्वी दिवस | 22 अप्रैल |
| जैव विविधता दिवस | 22 मई |
| विश्व पर्यावरण दिवस | 5 जून |
| विश्व ओजोन दिवस | 16 सितंबर |
| विश्व मृदा दिवस | 5 दिसंबर |
सतत विकास (Sustainable Development)
सतत विकास का अर्थ ऐसा विकास है जो वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को पूरा करे, लेकिन भविष्य की पीढ़ियों की अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने की क्षमता से समझौता न करे। इसमें आर्थिक विकास, सामाजिक न्याय और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करना आवश्यक है।
पर्यावरण संरक्षण के व्यावहारिक उपाय
- वनों एवं प्राकृतिक आवासों का संरक्षण।
- जल संरक्षण और वर्षा जल संचयन।
- सौर एवं पवन ऊर्जा जैसे नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देना।
- ऊर्जा दक्षता और सार्वजनिक परिवहन का उपयोग।
- प्लास्टिक के उपयोग में कमी और पुनर्चक्रण।
- जैविक कचरे का कम्पोस्ट निर्माण।
- जैव विविधता और स्थानीय प्रजातियों का संरक्षण।
- पर्यावरण शिक्षा और जनभागीदारी।
भारत के प्रमुख पर्यावरणीय कानून एवं संस्थाएँ
| कानून/संस्था | वर्ष | मुख्य भूमिका |
|---|---|---|
| वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम | 1972 | वन्यजीव संरक्षण और संरक्षित क्षेत्रों का कानूनी ढाँचा। |
| जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम | 1974 | जल प्रदूषण की रोकथाम एवं नियंत्रण। |
| वन (संरक्षण) अधिनियम | 1980 | वन भूमि के गैर-वन उपयोग का नियमन; 2023 में संशोधन। |
| वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम | 1981 | वायु प्रदूषण की रोकथाम और नियंत्रण। |
| पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम | 1986 | पर्यावरण संरक्षण के लिए व्यापक कानूनी प्रावधान। |
| जैव विविधता अधिनियम | 2002 | जैव विविधता संरक्षण, सतत उपयोग और लाभों का न्यायसंगत बँटवारा। |
| केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) | 1974 के कानून के अंतर्गत | जल एवं वायु प्रदूषण नियंत्रण से संबंधित केंद्रीय संस्था। |
| राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) | 2010 | पर्यावरण संबंधी मामलों का त्वरित निपटारा। |
| राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA) | 2003 | जैव विविधता अधिनियम के कार्यान्वयन में भूमिका। |
परीक्षा के लिए अति महत्त्वपूर्ण तथ्य – One Liner Revision
- पारिस्थितिकी शब्द का प्रयोग – अर्न्स्ट हैकेल, 1866।
- पारितंत्र शब्द – ए. जी. टैंसले, 1935।
- खाद्य श्रृंखला में ऊर्जा का प्रवाह – एकदिशीय।
- 10 प्रतिशत नियम – रेमंड लिंडेमैन, 1942।
- पारिस्थितिक पिरामिड की अवधारणा – चार्ल्स एल्टन।
- ऊर्जा का पिरामिड – हमेशा सीधा।
- संख्या एवं जैवभार का पिरामिड – सीधा या उल्टा हो सकता है।
- उत्पादक – हरे पौधे, शैवाल और कुछ जीवाणु।
- प्रमुख अपघटक – जीवाणु एवं कवक।
- नाइट्रोजन स्थिरीकरण – Rhizobium आदि।
- वायुमंडल में नाइट्रोजन – लगभग 78 प्रतिशत।
- जैव विविधता के स्तर – आनुवंशिक, प्रजातीय, पारितंत्रीय।
- हॉटस्पॉट की अवधारणा – नॉर्मन मायर्स, 1988।
- भारत से संबंधित वैश्विक जैव विविधता हॉटस्पॉट – चार।
- हॉटस्पॉट के मानदंड – 1,500 स्थानिक संवहनी पौधे और 70 प्रतिशत प्राकृतिक वनस्पति का विनाश।
- भारत का पहला राष्ट्रीय उद्यान – जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान।
- जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना – 1936; उस समय नाम हैली नेशनल पार्क था।
- भारत का पहला जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र – नीलगिरि, 1986।
- काजीरंगा – एक सींग वाला गैंडा।
- गिर – एशियाई सिंह।
- दुधवा – उत्तर प्रदेश।
- केइबुल लामजाओ – संगाई हिरण।
- हेमिस – हिम तेंदुआ।
- सुंदरबन – मैंग्रोव एवं रॉयल बंगाल टाइगर।
- IUCN – International Union for Conservation of Nature।
- IUCN रेड लिस्ट – नौ श्रेणियाँ।
- CR – Critically Endangered।
- EN – Endangered।
- VU – Vulnerable।
- CR + EN + VU – Threatened Categories।
- In-situ Conservation – प्राकृतिक आवास में संरक्षण।
- Ex-situ Conservation – प्राकृतिक आवास से बाहर संरक्षण।
- प्राथमिक अनुक्रमण – बिना विकसित मिट्टी वाले स्थान से शुरू हो सकता है।
- द्वितीयक अनुक्रमण – पहले से विकसित मिट्टी वाले प्रभावित क्षेत्र में।
- कार्बन चक्र – प्रकाश संश्लेषण, श्वसन, अपघटन और दहन।
- नाइट्रोजन चक्र – स्थिरीकरण, नाइट्रीकरण, अमोनीकरण और विनाइट्रीकरण।
- यूट्रोफिकेशन – जल में पोषक तत्त्वों की अत्यधिक वृद्धि।
- जैव आवर्धन – खाद्य श्रृंखला में उच्च पोषण स्तर पर प्रदूषक सांद्रता बढ़ना।
- ग्रीनहाउस गैस – CO₂, CH₄, N₂O, जलवाष्प आदि।
- ओजोन परत – समतापमंडल में।
- ओजोन क्षरण – CFCs एवं अन्य ओजोन क्षयकारी पदार्थ।
- मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल – 1987।
- किगाली संशोधन – 2016।
- रामसर कन्वेंशन – 1971।
- स्टॉकहोम सम्मेलन – 1972।
- रियो पृथ्वी सम्मेलन – 1992।
- पेरिस समझौता – 2015।
- Project Tiger – 1973।
- Project Elephant – 1992।
- Wildlife Protection Act – 1972।
- Environment Protection Act – 1986।
- Biological Diversity Act – 2002।
- विश्व पर्यावरण दिवस – 5 जून।
- विश्व जैव विविधता दिवस – 22 मई।
- विश्व आर्द्रभूमि दिवस – 2 फरवरी।
- विश्व ओजोन दिवस – 16 सितंबर।
अभ्यास प्रश्न – 50 महत्त्वपूर्ण MCQs
निर्देश: प्रत्येक प्रश्न का उत्तर देखने के लिए View Answer पर क्लिक करें। ये प्रश्न प्रतियोगी परीक्षाओं के पाठ्यक्रम पर आधारित अभ्यास प्रश्न हैं। इन्हें किसी विशेष परीक्षा का वास्तविक PYQ न समझें।
(A) चार्ल्स डार्विन
(B) अर्न्स्ट हैकेल
(C) ए. जी. टैंसले
(D) ग्रेगर मेंडल
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अर्न्स्ट हैकेल ने 1866 में Ecology शब्द का प्रयोग किया था।
(A) टैंसले
(B) ओडम
(C) लिंडेमैन
(D) एल्टन
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ब्रिटिश पारिस्थितिकीविद् टैंसले ने 1935 में Ecosystem शब्द प्रस्तुत किया।
(A) जीव → समुदाय → जनसंख्या → पारितंत्र
(B) जीव → जनसंख्या → समुदाय → पारितंत्र
(C) समुदाय → जीव → पारितंत्र → जनसंख्या
(D) जनसंख्या → जीव → समुदाय → जीवमंडल
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संगठन का क्रम जीव, जनसंख्या, समुदाय, पारितंत्र, बायोम और जीवमंडल है।
(A) जीवाणु
(B) कवक
(C) तापमान
(D) घास
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तापमान एक निर्जीव भौतिक पर्यावरणीय कारक है।
(A) मांसाहारी
(B) हरे पौधे
(C) परजीवी
(D) अपघटक
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हरे पौधे प्रकाश संश्लेषण द्वारा भोजन बनाते हैं।
(A) शेर और बाघ
(B) जीवाणु और कवक
(C) हिरण और खरगोश
(D) घास और शैवाल
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जीवाणु और कवक मृत जैव पदार्थों का अपघटन करते हैं।
(A) प्राथमिक उपभोक्ता
(B) द्वितीयक उपभोक्ता
(C) उत्पादक
(D) अपघटक
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उत्पादक खाद्य श्रृंखला के प्रथम पोषण स्तर पर होते हैं।
(A) खाद्य जाल
(B) खाद्य श्रृंखला
(C) जल चक्र
(D) नाइट्रोजन चक्र
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इसमें भोजन और ऊर्जा का क्रमिक स्थानांतरण होता है।
(A) खाद्य जाल
(B) जल चक्र
(C) जैवभार
(D) जैवमंडल
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खाद्य जाल अनेक परस्पर जुड़ी खाद्य श्रृंखलाओं का नेटवर्क है।
(A) टैंसले
(B) लिंडेमैन
(C) डार्विन
(D) हैकेल
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रेमंड लिंडेमैन ने 1942 में 10 प्रतिशत नियम प्रस्तुत किया।
(A) 10 kJ
(B) 100 kJ
(C) 1,000 kJ
(D) 5,000 kJ
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10,000 का 10 प्रतिशत = 1,000 kJ।
(A) संख्या का
(B) जैवभार का
(C) ऊर्जा का
(D) इनमें से कोई नहीं
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प्रत्येक अगले पोषण स्तर पर उपलब्ध ऊर्जा कम होती जाती है।
(A) केवल सीधा
(B) उल्टा
(C) कभी नहीं बनता
(D) हमेशा समान
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जलीय पारितंत्र में फाइटोप्लैंकटन का तत्कालीन जैवभार कम और उत्पादन दर अधिक हो सकती है।
(A) वन में एक पेड़ पर अनेक कीट
(B) घास के मैदान में अनेक घास के पौधे
(C) खेत में अनेक उत्पादक
(D) सभी स्थितियों में सीधा
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एक बड़ा पेड़ अनेक शाकाहारी कीटों को सहारा दे सकता है।
(A) चक्रीय
(B) एकदिशीय
(C) दोनों दिशाओं में समान
(D) स्थिर
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ऊर्जा का प्रवाह उत्पादकों से उपभोक्ताओं की ओर होता है और पुनर्चक्रित नहीं होता।
(A) Rhizobium
(B) Vibrio
(C) Salmonella
(D) Lactobacillus
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यह दलहनी पौधों की जड़ों की ग्रंथियों में नाइट्रोजन स्थिरीकरण करता है।
(A) 21 प्रतिशत
(B) 78 प्रतिशत
(C) 50 प्रतिशत
(D) 1 प्रतिशत
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वायुमंडल में लगभग 78 प्रतिशत नाइट्रोजन और 21 प्रतिशत ऑक्सीजन होती है।
(A) नाइट्रीकरण
(B) अमोनीकरण
(C) विनाइट्रीकरण
(D) आत्मसात्करण
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Denitrification में नाइट्रेट का गैसीय नाइट्रोजन में परिवर्तन होता है।
(A) दो
(B) तीन
(C) चार
(D) पाँच
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आनुवंशिक, प्रजातीय और पारितंत्रीय विविधता।
(A) नॉर्मन मायर्स
(B) चार्ल्स डार्विन
(C) टैंसले
(D) लिंडेमैन
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उन्होंने 1988 में जैव विविधता हॉटस्पॉट की अवधारणा प्रस्तुत की।
(A) दो
(B) तीन
(C) चार
(D) पाँच
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हिमालय, इंडो-बर्मा, पश्चिमी घाट-श्रीलंका और सुंडालैंड।
(A) लक्षद्वीप
(B) निकोबार द्वीपसमूह
(C) कच्छ
(D) पश्चिमी घाट
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भारत में सुंडालैंड हॉटस्पॉट का भाग निकोबार द्वीपों से संबंधित है।
(A) 500
(B) 1,000
(C) 1,500
(D) 2,500
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हॉटस्पॉट में कम-से-कम 1,500 स्थानिक संवहनी पादप प्रजातियाँ होनी चाहिए।
(A) 30 प्रतिशत
(B) 50 प्रतिशत
(C) 70 प्रतिशत
(D) 90 प्रतिशत
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मूल प्राकृतिक वनस्पति का कम-से-कम 70 प्रतिशत नष्ट हो चुका होना चाहिए।
(A) काजीरंगा
(B) जिम कॉर्बेट
(C) गिर
(D) दुधवा
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इसकी स्थापना 1936 में हैली नेशनल पार्क के नाम से हुई थी।
(A) गिर
(B) काजीरंगा
(C) रणथंभौर
(D) पेरियार
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काजीरंगा असम में स्थित है और एक सींग वाले गैंडे के लिए प्रसिद्ध है।
(A) गिर वन
(B) सुंदरबन
(C) दुधवा
(D) मानस
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गुजरात का गिर क्षेत्र एशियाई सिंह के लिए प्रसिद्ध है।
(A) मध्य प्रदेश
(B) उत्तर प्रदेश
(C) उत्तराखंड
(D) बिहार
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दुधवा राष्ट्रीय उद्यान उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र में स्थित है।
(A) हंगुल
(B) संगाई हिरण
(C) एशियाई सिंह
(D) हिम तेंदुआ
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यह मणिपुर में स्थित तैरते हुए फुमदी क्षेत्र का प्रसिद्ध राष्ट्रीय उद्यान है।
(A) नंदा देवी
(B) नीलगिरि
(C) सुंदरबन
(D) पचमढ़ी
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नीलगिरि जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र की स्थापना 1986 में हुई।
(A) पाँच
(B) सात
(C) नौ
(D) दस
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EX, EW, CR, EN, VU, NT, LC, DD और NE।
(A) EN
(B) CR
(C) VU
(D) NT
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CR का अर्थ अति संकटग्रस्त है।
(A) EX, EW, DD
(B) CR, EN, VU
(C) NT, LC, NE
(D) EX, CR, DD
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Critically Endangered, Endangered और Vulnerable को संकटग्रस्त श्रेणियाँ कहते हैं।
(A) Ex-situ
(B) In-situ
(C) कृत्रिम चयन
(D) जैव आवर्धन
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राष्ट्रीय उद्यान और वन्यजीव अभयारण्य In-situ संरक्षण के उदाहरण हैं।
(A) In-situ
(B) Ex-situ
(C) प्राकृतिक अनुक्रमण
(D) जैव आवर्धन
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प्राकृतिक आवास से बाहर संरक्षण Ex-situ कहलाता है।
(A) 1972
(B) 1973
(C) 1980
(D) 1992
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भारत में बाघ संरक्षण के लिए Project Tiger वर्ष 1973 में शुरू किया गया।
(A) 1973
(B) 1986
(C) 1992
(D) 2002
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Project Elephant हाथियों और उनके आवासों के संरक्षण के लिए शुरू किया गया।
(A) विकसित मिट्टी वाले पुराने खेत में
(B) नंगी चट्टान पर
(C) पहले से विकसित जंगल में
(D) कृषि भूमि में
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प्राथमिक अनुक्रमण ऐसे स्थान पर शुरू होता है जहाँ पहले विकसित मिट्टी या समुदाय नहीं होता।
(A) कोई मिट्टी नहीं
(B) पहले से विकसित मिट्टी
(C) केवल बर्फ
(D) केवल समुद्री जल
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द्वितीयक अनुक्रमण में पूर्व समुदाय के नष्ट होने के बाद भी मिट्टी बनी रहती है।
(A) वाष्पीकरण
(B) संघनन
(C) वर्षण
(D) अपवाह
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Condensation में जलवाष्प ठंडी होकर तरल जल की बूँदों में बदलती है।
(A) जैव आवर्धन
(B) यूट्रोफिकेशन
(C) अमोनीकरण
(D) नाइट्रीकरण
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नाइट्रोजन एवं फॉस्फोरस की अधिकता से शैवाल वृद्धि बढ़ सकती है।
(A) जैव अपघटन
(B) जैव आवर्धन
(C) प्रकाश संश्लेषण
(D) नाइट्रोजन स्थिरीकरण
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Biomagnification में स्थायी प्रदूषकों की सांद्रता उच्च पोषण स्तरों पर बढ़ सकती है।
(A) ऑक्सीजन
(B) नाइट्रोजन
(C) कार्बन डाइऑक्साइड
(D) हीलियम
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CO₂ प्रमुख मानवजनित ग्रीनहाउस गैसों में से एक है।
(A) क्षोभमंडल
(B) समतापमंडल
(C) मध्यमंडल
(D) बहिर्मंडल
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ओजोन परत समतापमंडल में सूर्य की हानिकारक UV किरणों को अवशोषित करती है।
(A) CFC
(B) ऑक्सीजन
(C) नाइट्रोजन
(D) हाइड्रोजन
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क्लोरोफ्लोरोकार्बन से निकलने वाले क्लोरीन परमाणु ओजोन के विनाश में भूमिका निभाते हैं।
(A) 1972
(B) 1985
(C) 1987
(D) 1992
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यह ओजोन क्षयकारी पदार्थों के नियंत्रण के लिए अंतरराष्ट्रीय समझौता है।
(A) 22 अप्रैल
(B) 5 जून
(C) 22 मई
(D) 16 सितंबर
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विश्व पर्यावरण दिवस प्रतिवर्ष 5 जून को मनाया जाता है।
(A) 22 मई
(B) 5 जून
(C) 2 फरवरी
(D) 3 मार्च
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International Day for Biological Diversity 22 मई को मनाया जाता है।
(A) मरुस्थल
(B) आर्द्रभूमि
(C) पर्वत
(D) केवल समुद्री मछलियाँ
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रामसर कन्वेंशन अंतरराष्ट्रीय महत्त्व की आर्द्रभूमियों के संरक्षण से संबंधित है।
(A) 1972
(B) 1974
(C) 1981
(D) 1986
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पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 पर्यावरण संरक्षण के लिए व्यापक कानूनी ढाँचा प्रदान करता है।
अंतिम पुनरावृत्ति – परीक्षा से पहले जरूर पढ़ें
- Ecology – Ernst Haeckel – 1866।
- Ecosystem – A. G. Tansley – 1935।
- 10% Law – Lindeman – 1942।
- Ecological Pyramid – Charles Elton।
- भारत के Biodiversity Hotspots – 4।
- Hotspot – 1,500 endemic vascular plants और 70% habitat loss।
- भारत का पहला National Park – Jim Corbett, 1936।
- भारत का पहला Biosphere Reserve – Nilgiri, 1986।
- काजीरंगा – एक सींग वाला गैंडा।
- गिर – एशियाई सिंह।
- दुधवा – उत्तर प्रदेश।
- केइबुल लामजाओ – संगाई।
- हेमिस – हिम तेंदुआ।
- IUCN Threatened – CR, EN, VU।
- In-situ – प्राकृतिक आवास में संरक्षण।
- Ex-situ – प्राकृतिक आवास के बाहर संरक्षण।
- Project Tiger – 1973।
- Project Elephant – 1992।
- Wildlife Protection Act – 1972।
- Environment Protection Act – 1986।
- Biological Diversity Act – 2002।
- रामसर कन्वेंशन – 1971।
- मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल – 1987।
- क्योटो प्रोटोकॉल – 1997।
- पेरिस समझौता – 2015।
- विश्व पर्यावरण दिवस – 5 जून।
- विश्व जैव विविधता दिवस – 22 मई।
- विश्व आर्द्रभूमि दिवस – 2 फरवरी।
संदर्भ एवं अध्ययन आधार
- NCERT – कक्षा 12 जीव विज्ञान: Organisms and Populations, Ecosystem, Biodiversity and Conservation.
- भारत सरकार, पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) – वन्यजीव एवं संरक्षित क्षेत्र संबंधी जानकारी।
- भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) – संरक्षित क्षेत्र एवं वन्यजीव संरक्षण संबंधी जानकारी।
- भारत सरकार – Biological Diversity Act, 2002.
- भारत सरकार – Wildlife (Protection) Act, 1972.
- IUCN – Red List Categories and Criteria.
- UNEP – Montreal Protocol एवं ओजोन परत संरक्षण।
- UNFCCC – जलवायु परिवर्तन एवं पेरिस समझौता।
- Convention on Biological Diversity – जैव विविधता संरक्षण के सिद्धांत।
